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तीज का महत्व

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संसार के आदि देव शिव जी को पति के रूप मे पाना कोई सहज कार्य नहीं था। शिव जैसे भोले और शक्तिशाली देव को पति के रूप में पाने की मनोकामना पार्वती जी में ऎसी थी कि उन्होंने सदियों तक तप किया। तप भी ऎसा नहीं कि एक जन्म में पूरा हो गया हो।

पार्वती जी को शिव जी को पाने के लिए 108 जन्म लेने पड़े। तब जाकर शिव प्रसन्न हुए, उन्होंने पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार किया। कहा जाता है कि श्रावणी तीज के दिन ही पार्वती जी अपने पति के घर पहुंची थीं। जन्मों की तपस्या का फल प्राप्त हुआ था। तीज पति और पत्नी के प्रेम का अद्भुत प्रतीक पर्व है। पार्वती जी ने कोई आपत्ति नहीं जताई, उन्होंने शिव जी जैसे थे, उन्हें उसी रूप में स्वीकार किया। उन्होने यह नहीं कहा कि मैं महलों में रहूंगी, कैलाश पर्वत पर कष्टकर जीवन वाले ससुराल मे नहीं जाऊंगी। मैं शिव के अजीबो-गरीब भक्तों के बीच नहीं रहूंगी।

शिव का स्वरूप तो बहुत डरावना था, नंगधड़ंग, भभूत और सांप लपेटे हुए, नंदी के साथ, भूत-प्रेतों के साथ विराजते और शिव जहां रहते थे, वहां भी किसी तरह की कोई सुविधा नहीं थी। किन्तु पार्वती जी ने कभी गिला-शिकवा नहीं किया कि मैं अपने बेघर पति के साथ नहीं रहूंगी, मुझे तो रहने के लिए महल चाहिए। कितना अद्भुत सर्वश्रेष्ठ प्रेम है शिव और पार्वती का, आदर्श सम्बंध, आदर्श जोड़ी, आदर्श माता-पिता। तभी तो गणेश और कार्तिकेय जैसे अनुपम देव पुत्रों का अवतरण हुआ। शिव और पार्वती की जोड़ी से आज लोग बहुत कुछ सीख सकते हैं, अपने जीवन को प्रेममय बना सकते हैं।

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Posted by on Aug 10 2013. Filed under हिन्दुत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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