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3 क्या, चाहे 300 लाख करोड़ रु. सोने के खज़ाने का सपना हो तो भी तोड़ देना चाहिए

The Dream Of Gold

The Dream Of Gold

‘अगर कोई बिल्ली आपका रास्ता काट जाती है। इसका मतलब यह है कि वह कहीं जा रही है।’- अमेरिकी अभिनेता ग्राउचो माक्र्स, अंधविश्वास पर बोलते हुए

कर्मठ भारतीय नागरिकों का अपमान कर रही है सरकार। सपनों में सोना ही तो आता है। हर अकर्मण्य के सपनों में। धक्का पहुंचता है हर उस व्यक्ति को जो परिश्रम से अपना जीवन चलाता है। उसकी चुनी हुई सरकार, साधुओं के कपोल-कल्पित सपनों पर तमाशा खड़ा कर रही है। ऐसा उसे चुनने वाला सपने में भी नहीं सोच सकता।
कोई पांच-सात हजार साल पुराने इस देश में न जाने कहां-क्या छुपा है। हो सकता है उत्तर प्रदेश के डोंडियाखेड़ा गांव में भी कुछ निकल आए। सोना। खजाना। या कि और कुछ। तो भी इस तथ्य को नकारना भयावह होगा कि सरकार और उसे चलाने वाले मंत्री अंधविश्वास को बहुत बड़े स्तर पर बढ़ावा देने वाला काम कर चुके हैं/रहे हैं।
कहा जा रहा है कि साधु शोभन सरकार को खजाने को अंग्रेजों से छुपाने वाले राजा राव  रामबख़्श ने, उनकी आत्मा ने, सपने में बताया कि यहां हजार टन सोना है। कीमत आज के हिसाब से कोई 3 लाख करोड़ । ३० लाख करोड़ का हो या ३०० करोड़ का, कुछ भी हो – तो भी वह कर्तव्य निभाने वाले, मेहनतकश, ईमानदार भारतीयों के लिए इसलिए फूटी कौड़ी का भी नहीं है – बल्कि $खतरनाक है – क्योंकि इससे अंधविश्वास लाखों-करोड़ गुना बढ़ जाएगा। केवल $गलत और झूठी धारणाएं ही पनपेंगी। किसी का भला नहीं होगा।
छुपे खजाने ने आज तक किसी का भला किया है कभी! चूंकि ऐसे खजाने वास्तव में होते तो हैं ही नहीं, इसलिए सिवाय एक झूठा जुनून जगाने के, कुछ नहीं होता। यह ऐसी दीवानगी पैदा कर देता है जो लोगों की जिंदगियां तबाह कर देती है।
तर्क यह दिया जा रहा है कि खजाना नहीं भी मिला, तो इसे पता लगाने की कोशिश में बुराई ही क्या है? सिर्फ इसलिए इसे बुरा नहीं कहा जा सकता चूंकि एक साधु को इसका सपना आया। क्योंकि हर संत-साधु आसाराम तो है नहीं। सही है। तर्क अपनी जगह एकदम ठीक है।
ऐसा ही सपना यदि किसी वैज्ञानिक को आया होता, तो क्या अंधविश्वास-विरोधी रेशनलिस्ट इस तरह आक्रोशित होते? ऐसा ही ‘विचार’ यदि आर्कियोलॉजिकल या जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के किसी अफसर को आता – तो भी वे खुदाई करने जाते। तब बुद्धिवादियों या वैज्ञानिक सोच रखने वालों को इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती।
सच ही तो है यह तर्क। बिल्कुल नहीं। सपना साधु का हो या वैज्ञानिक का, सपना ही होता है। विचार एकदम अलग बात है। विचार से तो विश्व चलता है।
कोशिश में बुरा ही क्या है? मिल गया तो कितनी तरक्की हो जाएगी डोंडियाखेड़ा गांव की। उत्तरप्रदेश की। देश की।
बिल्कुल नहीं। हजार टन सोना भी लगा दिया जाए उत्तरप्रदेश में तो कुछ नहीं होगा। राजनीतिक षडय़ंत्रों को शक्तिशाली तरह से बुनने में लग जाएंगे इतने पैसे। हजारों करोड़ के मुफ्त लैपटॉप बांटकर वोट खरीदने या दंगों के लिए, दंगों को फैलाने के लिए, बचने के लिए, हथियार खरीदने में लग जाएंगे काफी पैसे। अपनी मूर्तियां बनाने या $गरीबों के मसीहाओं के नाम पर भव्य पार्क, इमारतें और महापुरुषों को शर्मिंदा करने वाले विशालकाय स्मारकों पर खर्च हो जाएंगे। विधायकों को नई कारें, नई बंदूकों पर भी तो खर्च करना रह गया है।
कुछ नहीं होगा तीन लाख करोड़ के सोने से। 17 अक्टूबर २०१३ को ही आई रिपोर्ट में बताया गया है कि हजार टन सोना भारतीय और चीनी कन्ज्यूमर अगले वर्ष से पहले खरीद चुके होंगे।
खैर, प्रश्न न तो सोने का है, न उसकी मात्रा का, न उसकी कीमत का, न उसके उपयोग का। यह सब पूरी तरह अप्रासंगिक है। इतना उल्लेख मात्र इसलिए किया गया है कि ‘खजाने की खुदाई’ के पक्ष में जो कुतर्क दिए जा रहे हैं – उन पर बात अवश्य साफ होनी चाहिए।
प्रश्न केवल और केवल अंधविश्वास का है। कोई भी सरकार, विशेषकर नागरिकों द्वारा चुनी हुई सरकार, अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं दे सकती। अवैध तो है ही। अनैतिक भी है। चीन में तो एक पार्टी की, एकाधिकार वाली सरकार है। वहां काला जादू, नीली किताब, पीले कपड़े – या जो कुछ भी कहते हों – खूब चलता है और सरकार लगातार कानून बना-बनाकर इस पर रोक लगा रही है। सफल हो पा रही है, यह तो नहीं कह सकते, किन्तु काफी काम हो रहा है। पिछले साल ‘हाथ देखकर बच्चा कितना बुद्धिमान बनेगा’ जैसे झूठे ज्योतिष पर रोक लगा दी गई। कई गिरफ्तारियां हुईं।
हांगकांग में एक अलग तरह का ‘छुपा खजाना’ सरकार खोदती रहती है। वहां फेंग शुई के अंधविश्वास की सीमा ही नहीं है। इसलिए, सरकार को हर सार्वजनिक काम, हर प्रोजेक्ट की राह में आने वाले बंगले, जमीन, दुकान के हिस्सों का भारी मुआवजा चुकाना पड़ता है। कोई अपनी ज़मीन देता ही नहीं है – सरकार को दबना पड़ता है कि कोई हिस्सा एक निश्चित जगह तक उस बंगले के लिए ‘शुभ’ था फेंग शुई के हिसाब से । इसलिए पैसा दो। यह तथ्य ‘साऊथ चायना मॉर्निंग पोस्ट’ दुनिया के सामने लाया। तब से कुछ कमी आई है मुआवजे में।
कहा जा सकता है कि ‘बच्चे की बुद्धिमता’ और ‘फेंग शुई मुआवजे’ में बुरा क्या है? पुणे में निर्मम तरह से मार दिए गए प्रगतिशील सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर जिस काले जादू के विरुद्ध, डायन प्रथा के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे थे, वह तो वास्तव में श्रेष्ठ थी चंूकि उन अंधविश्वासों में निर्दोष लोगों/विशेषकर बेसहारा महिलाओं की जान ली जा रही थी। चीन, हांगकांग या डोंडियाखेड़ा के उदाहरणों में किसी की जान तो जा नहीं रही है। खरोंच तक नहीं आ रही। न ही कोई ठगा जा रहा है। बल्कि लोगों को फायदा हो रहा है।
जी, नहीं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। दाभोलकर ने अपनी समूची जिं़दगी ही इस पर समर्पित कर दी कि अंधविश्वास मिटे। कानून बने। किसी तरह इन पर रोक लगे। ध्यान से देखने पर जान इन सभी उदाहरणों में जा रही है – आज नहीं तो कल जाएगी। परसों और भयंकर होगा। कई लोग इसे जीवन भर खोजते रहेंगे। आने वाली पीढिय़ां की पीढिय़ां बर्बाद हो सकती हैं।
बच्चे की बुद्धि कम बताकर, पाखंडी ज्योतिषी परिवारों को ‘बुद्धि बढ़ाने के उपाय’ बताकर लूटते हैं। भले लोग चीन में लुटते चले जा रहे हैं। फेंग शुई मुआवजे को बढ़ाने/बढ़वाने के लिए लोग घूस देते जा रहे हैं/गलत काम करते जा रहे हैं। अफसर हिस्सा मांग रहे हैं। करोड़ों इधर से उधर अवैध रूप से बंट रहे हैं।
सब अपराध। सब अपराधी।
डोंडियाखेड़ा में अभी तो कुछ है ही नहीं। किन्तु बाकी भोले-भाले नागरिकों को तो छोडि़ए, वो क्या कहते हैं – ‘तेजतर्रार’, ‘फायर ब्रांड’ उमा भारती जो मुख्यमंत्री जैसे शीर्ष पद पर रह चुकी हैं, अभी से सक्रिय हो गई हैं। १८ अक्टूबर को जब खुदाई शुरू हो गई तो उन्होंने कहा – एक ट्रस्ट बनाना चाहिए ताकि इतने बड़े खजाने को समाजवादी पार्टी लूट कर न ले जा सके!! अब इसे क्या कहेंगे?
डोंडियाखेड़ा एक ऐसा झूठा सपना है जो हर उस व्यक्ति की आंखों में जगा बैठा है – जो अकर्मण्य है। खुली आंखों का यह दिवास्वप्न ऐसे लोग देखना बंद कर
दें – यह असंभव है। किन्तु इसे चूर-चूर करना ही होगा। सपने अच्छे कामों, उज्जवल भविष्य के देखे जाने आवश्यक हैं – खजानों – ख़ासकर छिपे, गड़े खजानों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं । वह हमारी छिपी लालसा का ही प्रतीक होते हैं। दिखते        नहीं – किंतु घातक होते हैं। तबाही का चमकीला सपना ही होते हैं।
पुलित्जर प्राइज विजेता अमेरिका के हफिंगटन पोस्ट ने सोने के ऐसे 12 छुपे/गड़े खजाने बताए हैं। जैसे- दुनिया का सबसे मशहूर ‘लॉस्ट डचमैन’ का खजाना, प्रचारित है कि यह एरिजोना में है। इन सभी १२ खजानों को खोजने में सैकड़ों जानें जा चुकी हैं। हजारों परिवार नष्ट हो चुके हैं।
13वें के रूप में कृपया डोंडियाखेड़ा मत आने दीजिए। कर्मवीर भारतीय आहत होते हैं।

कल्पेश याग्निक
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)

 

Posted by on Oct 19 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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