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आखिर गुस्से में क्यों है देश की जनता?

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राहुल गांधी ने कहा कि देश में गुस्सा बहुत है. उनका कहना बिल्कुल सही है, सही मायनों में देश गुस्से में है. उनकी पार्टी के नेताओं ने बयान ही ऐसे दिए हैं कि देश को गुस्सा आ गया है.

राशिद मसूद कहते हैं कि दिल्ली में खाना पांच रुपये में खाया जा सकता है जबकि राज बब्बर कहते हैं कि मुंबई में 12 रुपये में भरपेट भोजन किया जा सकता है. फारुक अब्दुल्ला तो और भी आगे निकल गए कह दिया कि खाना तो एक रुपये में भी आ सकता है.

जब गरीबी और बेबसी का मज़ाक उड़ाया जाएगा तो देश को गुस्सा आएगा ही. सरकार को शुक्र मनाना चाहिए कि जनता अपना गुस्सा फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉगर पर ही व्यक्त करके रह जाती है वरना उसके लिए दिक्कतें पैदा हो जातीं. जनता का एक चेहरा वो है जो जैसे तैसे अपना जीवन यापन कर रहा है, रोज़ाना कुआं खोद कर पानी पीता है, रोज़ कमाता है तभी खा पाता है. अखबार और टीवी से दूर बस खाने की जुगत में लगा हुआ वो आदमी गुस्से में है क्योंकि खाने के दाम वही चुकाता है.

राहुल गांधी अगर टीवी देखते तो उनको पता होता कि देश गुस्से में क्यों है. आलू, टमाटर और प्याज़ के दामों पर टीवी चैनल स्टोरी कर रहे हैं शायद ये स्टोरियां राशिद मसूद और राज बब्बर ने नहीं देखीं वरना बयान देने से पहले संभवत: वो थोड़ा सोचते. पहले सब्जी ना होने की स्थिति में चटनी या प्याज के साथ रोटी खाने की बात कह दी जाती थी, लेकिन अब हालात ये हैं कि सब्जी से ज्यादा महंगी तो चटनी, प्याज़ हो गई हैं.congress

एसी कमरों में बैठ कर अपनी सरकार का बखान करना और आंकडे जारी करना सरकार, नेताओं और अफसरों के लिए आसान काम है लेकिन जून की दोपहर में रिक्शा खींचने वाले से पूछिए कि क्या वो पांच रुपये में खाना खा पाता है, उस मजदूर से पूछिए जो पूरे दिन सिर पर ईंट ढोता है, उस किसान से पूछिए जो भरी दोपहरी में फसल को काटता है. जवाब यही मिलेगा कि दिल्ली मुंबई तो क्या पांच रुपये में किसी गांव में भी खाना नहीं मिलता.

पेट्रोल से लेकर दाल तक, आटे से लेकर सब्जी तक, जमीनों से लेकर पढाई तक सबके दाम इतने ज़्यादा हैं कि आम इंसान इनके बोझ से दब गया है, और बोझ से दबा हुआ वो इंसान सिर्फ ये सोचता है कि शाम को खाना कैसे मिलेगा. ऐसे में कांग्रेसी नेताओं के ऐसे बयान जले पर नमक छिड़कने वाले हैं.

रशीद मसूद के क्षेत्र सहारनपुर और राज बब्बर के क्षेत्र आगरा में भी पांच या 12 रुपये में खाना नहीं आता. खुद को जनता का प्रतिनिधि कहने वाले ये लोग सिर्फ अपनी पार्टी के प्रतिनिधि की तरह क्यों सोचते हैं? कुछ बोलने या बयान देने से पहले ये लोग क्यों जनता की भावनाओं का ध्यान नहीं रखते? पिछले 10 साल से देश पर शासन करने वाली सरकार को क्या ये नहीं पता है कि जनता का हाल क्या है?

राज बब्बर ने अपने बयान पर खेद जता दिया और कांग्रेस पार्टी ने खुद को उनके बयान से खुद को अलग कर लिया लेकिन इससे क्या होगा? कांग्रेस का दावा है कि महंगाई घटी है लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हुआ जवाब हम सभी जानते हैं लेकिन सरकार द्वारा ऐसा कहना क्या गरीब का मजाक उड़ाना नहीं है.

और यहीं छुपा है राहुल गांधी के सवाल का जवाब. देश का गुस्सा कम करना है तो देश की भावनाओं को समझना होगा वरना पार्टी को देश का गुस्सा बहुत महंगा पड़ेगा.

 

लेखक  : वरुण कुमार

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Posted by on Jul 27 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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