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पछतावे की भाषा में काव्य नहीं होता

sexual assault

यौन दुव्र्यवहार का आरोप लगने के बाद पुरुष जो बकवास करते हैं उसे पढऩा-सुनना मजेदार होता है। इसकी सीधी-सी वजह यह है कि ज्यादातर पुरुष महिलाओं के साथ ऐसे व्यवहार को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। उनकी परवरिश ही ऐसे माहौल में होती है कि उन्हें यकीन हो जाता है कि सारे ही पुरुष, यदि वे असली मर्द हैं तो ऐसा ही करते हैं। यह लाखों तरीके से कहा गया है- किताबों, गीतों, फिल्मों और  सबसे ज्यादा इसे विज्ञापनों में बार-बार दोहराया गया है कि जब कोई महिला ‘नहीं’ कहती है तो वास्तव में उसका अर्थ ‘हां’ होता है।

सिर्फ पुरुष ही ऐसा नहीं कहते, महिलाएं भी यही कहती हैं कि कोई नारी ऐसी नहीं होती, जो पुरुषों से संबंध की बिलकुल ही इच्छुक न हो, बस थोड़ा प्रेरित करने की जरूरत होती है। द्विअर्थी संवादों के लिए मशहूर अमेरिकी अभिनेत्री मे वेस्ट ने जब ऐसा कहा था तो हो सकता है कि वे उस समय चुटकियां लेने के कुछ ज्यादा ही मूड में थीं, लेकिन मुझे लगता है कि पुरुषों ने इस सलाह को दिल से स्वीकार कर लिया। हालांकि प्रेरित करने को लेकर अलग-अलग पुरुषों का नजरिया अलग-अलग होता है। कोई आदमी महिला के सिर पर बेसबॉल का बल्ला मार दे और उसे घसीटकर बेडरूम में ले जाए तो हो सकता है कि कोई दूसरा आदमी शैम्पेन के प्याले में चार कैरेट के हीरे की अंगूठी डालकर संकेत दे। सिर्फ तरीके का फर्क है, इरादे का नहीं।

अब देखा जाए तो डेट पर आई गर्ल फ्रेंड के वॉशरूम जाने का फायदा उठाकर उसके कॉकटेल में मादक दवा मिलाने वाले और उस आदमी में कोई फर्क नहीं है, जो भद्दे तरीके से लिफ्ट में एक महिला पर हाथ डालता है इस उम्मीद में कि शायद इससे कोई ज्यादा रोमांचक नतीजा निकले। असलियत यह है कि ऐसा शायद ही कभी होता हो। हाथ डालना तो  हाथ डालना ही होता है। झूमा-झटकी करने वाला भी बस झूमा-झटकी करने वाला ही बना रहता है। इस सबसे ज्यादा त्रासद तो यह है कि सिर पर पिगटेल चोटी बांधने वाला रोमियो दिनभर तो अपने ऑफिस मेें हुक्म चलाता है और सूरज डूबने के बाद अपनी जूनियर पर झपट पड़ता है। इसे फुसलाना भी नहीं कहा जा सकता यह तो सत्ता का नग्न प्रदर्शन है।

यदि हमारे ठसकेदार संपादक ने वह किया है, जिसका उन पर आरोप है तो उनका यह अपराध सबसे घिनौने अपराधों की श्रेणी में सबसे खराब गुनाह ही माना जाएगा। हालांकि यहां मेरा इरादा उनकी छवि पर कालिख पोतना नहीं है। ऐसा करने के लिए हमारे आस-पास लोगों की कमी नहीं है। मेरी चिंता यह है कि अब जब मुकदमा शुरू हो चुका है तो इसमें सारे सबूतों का तर्कसंगत ढंग से आकलन होना चाहिए, उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए और फिर न्यायपूर्ण नतीजे पर पहुंचना चाहिए। अभी तो हम जो कर रहे हैं वह घोड़े के आगे तांगा लगाने जैसा है

इस समय चाहे सत्य बिलकुल साफ नजर आ रहा हो, लेकिन तथ्यों को चकमा देने की विचित्र आदत होती है। इसलिए जब तक मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाए और न्याय कर न दिया जाए, बेहतर होगा कि हम जान लेने पर उतारू हिंसक भीड़ की तरह व्यवहार करना बंद कर दें। कथित अपराध के हर अशालीन ब्योरे की बारीकी से चर्चा और उसकी छिलाई-कटाई से शायद ही कभी पीडि़ता को कोई मदद मिलती है। वह तो सामने आकर और न्याय की गुहार लगाकर पहले ही अपनी हिम्मत और बहादुरी दिखा चुकी है। अब सत्यनिष्ठा की मांग यही है कि उसे जल्दी न्याय मिल जाए और वह भी भाजपा या कांग्रेस के इस मुद्दे में जबरन घुस आए बगैर यानी मामले के राजनीतिकरण के बिना फैसला होना चाहिए।

जहां तक तेजपाल का सवाल है तो उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ही ली है। उनका पत्रकारिता में कॅरिअर तो खत्म जैसा ही है।  ऐसा कॅरिअर जिस पर हमेशा ही उनके नैतिक मूल्यों को लेकर कई अनुत्तरित प्रश्न मंडराते रहे हैं। वही हाल उनकी उस जिंदगी का है, जैसा उन्होंने उसे अब तक जिया है। दुष्कर्म के आरोपों के साथ जीना आसान नहीं होता फिर चाहे उन्हें सिद्ध न भी किया जा सका हो। न तो उन्हें आसानी से भुलाया जाता है और न ही उतनी आसानी से माफ किया जाता है। यहां तक कि जेल में भी ऐसे दोषियों का स्वागत लात-घूंसों की जबर्दस्त ठुकाई और खटकेदार चाकुओं से ही होता है। मेरा मानना है कि अब तक जो हुआ इससे काफी हद तक बचा जा सकता था जब तेजपाल सिर्फ पीडि़ता से माफी मांग लेते और खुद को मुकदमा चलाने के लिए प्रस्तुत कर देते।

स्वयं को अपराध बोध से पीडि़त बताते हुए और खुद को अपने ऑफिस से छह माह तक दूर रखने की पेशकश करने वाले उनके शब्द-अलंकारों से भरे पत्र का सुर इतना अपमानजनक है कि यह पढ़कर उन लोगों को भी गुस्सा आ गया जो उन्हें संदेह के आधार पर कुछ उदारता दिखाना चाहते थे। पत्र की आलंकारिक भाषा और उससे झलकती ढीठता ने हर किसी को रुष्ट कर दिया। दुष्कर्म के किसी आरोपी से लच्छेदार और काव्यात्मक आलंकारिक भाषा की अपेक्षा तो किसी को नहीं होती। पर नहीं, वे सिर्फ इतना करके ही नहीं रुके। वे उस अभागी पीडि़ता पर ऐसे और मैसेजेस की बमबारी करते रहे, जिसमें जरा-सा भी पश्चाताप झलक नहीं रहा था।

लगता है तेजपाल खुद को हॉलीवुड की विवादास्पद फिल्म फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे के नायक क्रिश्चियन ग्रे समझते हैं। ऐसा ही तो वे खुद को पेश करते नजर आते हैं  जब वे सच का सामना करने से बचने के लिए हर संभव बहाना आजमाने पर उतारू हो जाते हैं। जबकि सच सिर्फ इतना था कि लड़की को उनमें कोई रुचि नहीं थी। किसी तरह की नहीं।
उनके जहर उगलते मैसेज और उन्हें भेजने के लटके-झटके किसी ऐसे स्थानीय पिज्जा बॉय जैसे थे, जिसे टिप नहीं दी गई हो। इस सबने उस सारी सहानुभूति की संभावना खत्म कर दी जो उन्हें मिल सकती थी। लड़कियों का पीछा करने वाले, ठुकरा दिए जाने पर मूर्खतापूर्ण हरकतें करते हैं। किंतु जिस प्रकार का आलंकारिक भाषा वाला पत्र उन्होंने लिखा, जैसे मैसेज भेजे, उससे बढ़कर तो मूर्खतापूर्ण कुछ हो ही नहीं सकता। वे अनुचित तो थे ही, फूहड़ भी थे।

अठासी साल के नारायणदत्त तिवारी भी ऐसी ही शर्मनाक परिस्थिति में पकड़े गए थे और वह भी राजभवन में। पर बच निकले, क्योंकि वे सिर झुकाकर चले गए और अपना मुंह बंद रखा। कोई सफाई देने की कोशिश नहीं की। आलंकारिक भाषा में कोई पत्र नहीं लिखा। कोई मूर्खतापूर्ण बहादुरी नहीं दिखाई। इस आदमी का चाहे खुद पर नियंत्रण नहीं था, लेकिन वह अच्छी तरह जानता था कि मुंह कब बंद रखना है। तेजपाल उनसे सबक ले सकते थे।

लेखक : प्रीतीश नंदी

Posted by on Dec 5 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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