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जी हां, प्रधानमंत्रीजी; दुनिया में सिर्फ हमारे यहां ऐसा होता है!

‘क्या दुनिया में कहीं ऐसा होता है कि प्रधानमंत्री का ऐसा अपमान किया जाए।’  – डॉ. मनमोहन सिंह 

शुक्रवार ३० अगस्त’१३ को संसद में
यह कड़वा सच है। किन्तु इसके अपने कारण हैं। अपमान-मान राजनीति में स्थायी नहीं होते। होते भी हैं या नहीं – कुछ तय नहीं। राजनीति में सिर्फ और सिर्फ राजनीति होती है। डॉ. मनमोहन सिंह ने सत्ता के दसवें साल में अपमानित होने का दर्द उजागर किया। जिस विपक्ष से आहत होकर उन्होंने ऐसा कहा, वहां तो इज्ज़त-जिल्लत की हालत और भी खराब है। वर्षों से। इस विपक्ष का तो इतना अपमानजनक हाल है कि इसे पता ही नहीं चलता कि क्या कह कर उसे सत्ता पक्ष का विरोध करना है। या कि बखूबी पता है।

फिर भी चुप रहकर अपमान के घूंट पीते हैं। प्रमुख विपक्षी भाजपा में तो कई नॉन-रेसिडेंट कांग्रेसी हैं! यह एक अपनी तरह का अपमान है। विपक्षी वाम दलों की सारी राजनीति कांग्रेस छीन चुकी है। या कि तृणमूल कांग्रेस के हाथों •ालालत झेलनी पड़ती है। उधर, राज्यों से राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की उड़ान भरते विपक्षी दलों की दुर्दशा अलग ही है। समाजवादी पार्टी के नेता मुलायमसिंह यादव हर बात में कांग्रेस का विरोध करते हैं और हर बात में समर्थन के लिए डटे भी न•ार आते हैं। अजीब सा अपमान। और है मायावती की बसपा।

मुलायम की पुरजोर विरोधी। कांग्रेस की धुरविरोधी। संसद में दोनों का समर्थन करने का अपमान फिर भी सहती है।
जी, हां प्रधानमंत्री जी; यह सब भी दुनिया में सिर्फ हमारे यहां ही होता है। कोई म•ााक नहीं है यह। धोखा है देश के नागरिकों से। सब दे रहे हैं।
सबसे बड़ा धोखा एक दिन पहले ही दिया है। खाद्य सुरक्षा यानी फूड सिक्योरिटी बिल को पास कराने में एकजुटता दिखाकर। $गरीबों को धोखा दिया है – उन्हीं के नाम पर। किसानों को धोखा दिया है – झूठे वादे कर।
… और देश के उन मेहनती युवाओं को सबसे बड़ा धोखा दिया है जो दिन-रात पढ़कर, कड़ी परीक्षाएं देकर, एक मुकाम पर पहुंच रहे हैं। वहां से आगे बढऩे के लिए संघर्ष कर रहे हैं। देश की ग्रोथ में कहीं न कहीं म•ाबूत भूमिका निभा रहे हैं। जिम्मेदार नागरिक हैं। टैक्स भर रहे हैं। कमा रहे हैं। खर्च कर रहे हैं।
आज की इकोनॉमी वास्तव में क्या है – स्पेंडिंग इकोनॉमी ही तो देश चला रही है। उद्योग व कारोबार कमा रहे हैं (‘थेÓ कहना ज्यादा ठीक होगा) तो रोजगार बढ़ते हैं (यहां भी ‘थेÓ। पैसा बा•ाार में आता है। आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं। छोटी दुकानें चलने लगती हैं। जो कम पढ़ सके, उन्हें भी काम मिलने लगता है। परिवार के परिवार चलने लगते हैं।

कम•ाोर भी मुख्यधारा में आने लगते हैं। कारखानों से लेकर मॉल-मल्टीप्लैक्स तक और हवाई अड्डों से लेकर गांव के टूटे-फूटे एप्रोच रोड तक पहुंचने वाले निरंकुश पैसेंजर टैक्सियों तक अर्थव्यवस्था पहुंचती है। इसी से चलती है। जितना अमीर उद्योगपति जीडीपी में योगदान देता है उतना ही $गरीब किसान। बड़े शहरों से लगाकर गुमनाम गांवों तक खुशहाली का दूसरा सबसे बड़ा पैमाना इकोनॉमिक डेवलपमेंट ही है। पहला है – आ•ाादी। खुले, बिना डर के, अपनी मर्जी से जीने, बोलने, चुनने की आ•ाादी।
तो खाद्य सुरक्षा कानून में ऐसा क्या कर दिया सभी पार्टियों ने कि धोखा कहा जाए? वे तो देशभर को भरपेट खाना मिल जाए, इस पवित्र उद्देश्य के लिए एकजुट हुए थे। चाहे वोटों का फायदा लेने के लिए कांग्रेस इस कानून को लाई हो। कुछ भी हो। कुल जमा तो $गरीबों का, देश का फायदा ही होगा। जी, नहीं। सच्चाई यह नहीं है।
सबसे पहले, क्या होगा इस कानून से? समझिए सरकार के दावे और उनकी हकीकत से
* कोई ८२ करोड़ लोग इसके अंतर्गत अब नाममात्र कीमत पर अनाज पाएंगे। कुल जनसंख्या का ६७’।
– सबसे पहला धोखा तो यही है। यदि देश तय ही कर रहा है कि इतिहास बनाना है – सभी पक्ष-विपक्ष साथ हैं तो यह सौ प्रतिशत के लिए होना चाहिए। ६७’ क्यों?
* नहीं, ऐसी गारंटी सिर्फ $गरीब वर्ग के लिए होनी जरूरी है। सभी को ऐसा फायदा न देना चाहिए, न ही उन्हें चाहिए।
– तो $गरीबों की संख्या 22′ ही बताई है योजना आयोग ने। (और पहले इसी कॉलम में यह विस्तार से बात हो चुकी है कि किस तरह सरकार के ही अलग-अलग मंत्रालय अलग-अलग आंकड़े दे चुके हैं $गरीबों के नाम पर।)
* सरकार का उद्देश्य •यादा से •यादा को फायदा पहुंचाना है। गांवों के 75′ लोग और शहरों के ५०’  लोग इससे फायदा ले सकेंगे।
– डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने इस पर तीखा प्रहार किया था संसद में। ‘मैं शहर में रहता हूं। मैं क्या खाऊं? कोयला? या कि स्पैक्ट्रम?Ó हालांकि उन्हीं की भाजपा ने भारी विरोध दिखाकर भारी समर्थन देते हुए इसे पास करवाया। धोखा।
* लोगों को त्र३ में चावल, त्र2 में गेहूं और त्र1 में बाजरा-ज्वार मिलेगा। 75′ ग्रामीणों व आधे शहरी लोगों को ही सही। इसमें धोखा कैसा? और अच्छे कामों में यदि पार्टियां मतभेद भुलाकर साथ आती हैं, तो इसमें धोखा क्या है? मीडिया हर बात में $गलत क्यों देखता है?
– तमिलनाडु में तो २० किलो चावल अभी भी मुफ्त में दिया जा रहा है $गरीबों को। आंध्र में त्र1 किलो की दर से महीने में ३५ किलो चावल दिया जा रहा है।  ‘छत्तीसगढ़ मॉडलÓ तो पहले से चर्चित है। वहां के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने तो इसे लागू करने से भी इनकार कर दिया है। वे प्रतिमाह २५ किलो नहीं 35 किलो चाहते हैं। क्योंकि इतनी जरूरत है हर व्यक्ति को। केरल व कर्नाटक में भी त्र2 की दर से मिल रहा है। तो कौन इसे नया या बेहतर मानेगा? महंगा देकर धोखा ही तो है।
* बिहार-झारखंड और उत्तरप्रदेश में तो ऐसा कुछ नहीं है …
– जी, हां यही तो वोट की राजनीति है। कांग्रेस को बिहार-झारखंड और उत्तरप्रदेश की ही तो 132 लोकसभा सीटों का ध्यान है। यहीं तो उसकी हालत खराब है। बिहार में वह तीसरे और उत्तरप्रदेश में छठे-सातवें नंबर पर है। बल्कि ‘जमानत जब्तÓ वाली पार्टी के रूप में स्थापित है। लोकसभा चुनावों में हालांकि उसे राष्ट्रीय मुद्दों का फायदा मिलता है। और वहां कौनसी यह योजना लागू हो जाएगी? बिहार ने कह दिया है २००० करोड़ रु. चाहिए। केंद्र देगा, तभी लागू करेंगे।
* खर्चे की तो कोई बात ही नहीं है। ‘सोनिया गांधी का सपनाÓ है यह। पहले ही मीडिया ने व्यर्थ कोहराम मचा रखा है कि 1 लाख ३० हजार करोड़ कहां से आएंगे? पहली बात तो सपनों की कोई कीमत नहीं देखता। $खासकर विश्व इतिहास में भारत का नाम इस महान् सामाजिक क्रांति के माध्यम से दर्ज़ कराना ही सोनिया गांधी का सपना है। ऐसे में खर्च गिनने बैठेंगे तो इतिहास के कूड़ेदान तक में जगह नहीं मिलेगी। मीडिया ठीक से हिसाब लगाए – त्र 1 लाख ३० हजार करोड़ का नया खर्च नहीं है। त्र ९० हजार करोड़ पहले ही खाद्य सब्सिडी दी जा रही है। भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अन्त्योदय योजना लाई थी। कांग्रेस सरकार मिड-डे मील लाई। सब चल रही हैं।
– ‘खर्चे की कोई बात नहीं हैÓ यह लापरवाही ही तो सारे देश की भारी चिंता का विषय बनी हुई है। त्र४० हजार करोड़ तो फिर भी नए खर्च होंगे। कहां से आएंगे? खजाना खाली। प्रधानमंत्री बजाए इसके कि कोई कठोर फैसला, कोई ठोस उपाय लाते, कह रहे हैं कि सोना मत खरीदिए, पेट्रोल मत जलाइए, ये मत कीजिए – वो बंद कर दीजिए..। रुपया टूट चुका है। अर्थव्यवस्था फूट चुकी है। अब सोनिया गांधी का सपना न टूटे, इसलिए देश के लोगों को, आम भारतीय को लूटना जरूरी है। खर्च की चिंता कैसे न करें? टैक्स तो हम ही देंगे। महंगा तो हम ही खरीदेंगे। महंगी जिंदगी।

वास्तव में सस्ती जिंदगी। और सबसे महंगा तो $गरीब खरीदता है। कई लीटर, कई किलो जो खरीद नहीं पाता। छोटी शीशी में तो सोया तेल का रेट, घी के बड़े पैक के रेट से भी महंगा पड़ता है। भ्रष्टाचार का प्रतीक बनी राशन दुकानें अब किसान को तोड़कर ३२ से ८२ करोड़ लोगों को पहुंचाए जाने वाले अन्न के भ्रष्टाचार का नया, बड़ा अड्डा बनेंगे। सपना नहीं टूटना चाहिए लेकिन।
वोटों के लिए देश के साथ अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़ बंद होना असंभव ही है। किन्तु रोकना ही होगा। खासकर तब जबकि हालत गुजरे जमाने के सोवियत संघ से मिलती जुलती हो रही हो। तब अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन ने कटाक्ष किया था कि :
रूस में यदि दूसरी पार्टी बनने भी दी जाए तो भी एक-पार्टी-सिस्टम ही बना रहेगा। क्योंकि … सारे नेता उस दूसरी पार्टी में शामिल हो जाएंगे! खाद्य से अपनी सुरक्षा करने के प्रहसन में सभी पार्टियां, कांग्रेस में शामिल ही तो दिखीं!

कल्पेश याग्निक
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)

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Posted by on Aug 31 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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