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अचानक हुई मुलाकात पर हंगामा अनावश्यक

Ved Pratap Vaidik And Hafiz Saeed Interview

  

मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद के साथ मुलाकात को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं। मुलाकात का उद‌्‌देश्य क्या था? सईद का इंटरव्यू किस प्रकाशन के लिए किया गया? तीखे सवालों के जवाब भी सईद ने ऐसी “विनम्रता’ से क्यों दिए, जबकि यह उसकी करतूतों से मेल नहीं खाता? सईद व एक भारतीय पत्रकार की मुलाकात में जो तनाव नजर आना था, वह नदारद क्यों था? यहां लेखक ने इन्हीं सवालों के जवाब देने का प्रयास किया है। साथ में पाठकों की सुविधा के लिए विवादित इंटरव्यू :

  

हाफिज सईद से मुलाकात अचानक तय हुई। 2 जुलाई की दोपहर मैं भारत लौटने वाला था। 1 जुलाई की शाम को कुछ पत्रकार मुझसे बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आप भारत-विरोधी आतंकवाद का मुद‌्दा इतनी जोर से उठा रहे हैं तो आप कभी हाफिज सईद से मिले? मैंने कहा, नहीं। उनमें से लगभग सबके पास हाफिज के नंबर थे। उनमें से किसी ने फोन मिलाया और मुलाकात तय हो गई। सुबह 7 बजे इसलिए तय हुई कि मुझे लाहौर हवाई अड‌्डे पर 10-11 बजे के बीच पहुंचना था। मैंने कह दिया था कि अगर मुलाकात देर से तय हुई तो मैं नहीं मिल सकूंगा।

  

इस मुलाकात के लिए मैंने न तो अपने किसी राजनयिक से संपर्क किया और न ही पाकिस्तान के किसी नेता या अधिकारी से। इसके पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री, विदेश सचिव और अनेक केंद्रीय तथा प्रांतीय नेताओं से मेरी भेंट हो चुकी थी। फौज और विदेश मंत्रालय के अनेक सेवानिवृत्त अधिकारियों से भी मैं मिल चुका था। मैं पाकिस्तान समेत पड़ोसी देशों में दर्जनों बार जा चुका हूं। पूरे 45 साल से मेरा यात्रा संपर्क बना हुआ है। कई पड़ोसी देशों के लोग, जो मेरे साथ भारत या विदेशों में पढ़ते थे, वे अपने-अपने देश के नेता बन गए हैं। इनमें संपादक व प्रोफेसर भी हैं। पड़ोसी देशों के टीवी चैनलों पर अक्सर मेरे कार्यक्रम होते रहते हैं, वहां के अखबार भी मेरे लेख छापते रहते हैं। पड़ोसी देशों के विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थानों में आयोजित सेमिनारों में मुझे आमंत्रित किया जाता है। इस बार भी एक भारत-पाक संवाद में मुझे आमंत्रित किया गया था।

 

पेशे से पत्रकार हूं, इसलिए मैं इन अवसरों का उपयोग पत्रकारिता के लिए करता ही हूं। यदि बहुत ही महत्वपूर्ण हो तो उस भेंट को मैं इंटरव्यू के तौर पर लिख देता हूं, वरना अपने लेखों में उनका इस्तेमाल कर लेता हूं।
जब मैंने हाफिज सईद से मिलने की हां भरी तो वह बिल्कुल अचानक थी। मेरी पहले से कोई कल्पना नहीं थी, लेकिन जब भेंट तय हो गई तो मैंने सोचा कि चाहे जो भी हो, मुझे उससे मुंबई-हमले के बारे में सीधे सवाल पूछने चाहिए। यह इंटरव्यू किसी खास अखबार के लिए पहले से प्रायोजित नहीं था। इससे पहले मैं अपने स्तंभ में दो-तीन लेख मेरी पाकिस्तान-यात्रा पर लिख चुका था।
मैंने टि्वटर पर न तो हाफिज सईद का फोटो और न ही इंटरव्यू पहले दिया। इंडिया टीवी के एंकर रजत शर्मा ने कहा कि वे  हाफिज पर एक घंटे का विशेष कार्यक्रम कर रहे हैं। इसमें आप क्यों नहीं बताते कि वह कैसा है, उसका दिमाग कैसे चलता है? रजत शर्मा और हेमंत शर्मा को मैंने दो-चार दिन पहले पाकिस्तान में सबसे मिलने की बात बताई थी। यदि मुझे मोदी सरकार ने भेजा होता तो अपने पत्रकार-बंधुओं या अपनी पत्नी को भी मैं क्यों बताता? यदि यह भेंट कूटनीतिक या गोपनीय होती तो सदा गोपनीय ही रहती, चाहे फिर मुझे इसकी कितनी ही कीमत चुकानी पड़ती। रजतजी के मांगने पर मैंने उसी समय ई-मेल पर हाफिज के फोटो मंगाए और उन्हें शायद डेढ़-दो घंटे पहले ‘फारवर्ड’ करवाए। दूसरे दिन सिर्फ फोटो वेबसाइट पर डाले। इस भेंट को शब्दों में बयां करता उसके पहले ही देश में हमारे कुछ नेताओं और चैनलों ने हंगामा खड़ा कर दिया।

  

हाफिज सईद के साथ बातचीत के दौरान मुझे इस बात का बहुत आश्चर्य हुआ कि वह मेरे तीखे सवालों से थोड़ा उत्तेजित तो हुआ, लेकिन बौखलाया बिल्कुल भी नहीं। इतना भयंकर आतंकवादी संयमित कैसे रह सका? शुरू-शुरू के पांच-सात मिनट मुझे ऐसा जरूर लगा कि वातावरण बहुत तनावपूर्ण है और कहीं ऐसा न हो कि बात एकदम बिगड़ जाए। अनेक बंदूकधारी कमरे के बाहर और अंदर भी खड़े थे। मैं ऐसे दृश्य अफगानिस्तान में प्रधानमंत्री हफीजुल्लाह अमीन के साथ भी 35 साल पहले देख चुका हूं। घंटे भर की बातचीत में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन तू-तू, मैं-मैं की नौबत नहीं आई। किन्हीं फूहड़ शब्दों का इस्तेमाल नहीं हुआ। सारी बातचीत के बाद मुझे लगता है कि हाफिज सईद का व्यक्तित्व एक पहेली है। बातचीत खत्म होने के बाद वह मुझे कार तक छोड़ने आया। मैं समझता हूं कि अदालतें, सरकार और फौज तो अपना काम करें ही, लेकिन हाफिज जैसे लोगों से किसी न किसी तरह बातचीत जारी रखी जा सकती है। मिजोरम के बागी लालडेंगा से मेरा संपर्क था, जिसका फायदा देश को मिला। मेरी इस भेंट पर हंगामा अनावश्यक है।

  

दहशतगर्दी से लेना-देना नहीं: सईद

 

हाफिज सईद: मैं आपके लेख पढ़ता रहा हूं और आपके टीवी इंटरव्यू भी मैंने देखे हैं। अपने बारे में थोड़ा और बताइए।
वेदप्रताप वैदिक: मैं अखबार और एक न्यूज एजेंसी का संपादक रहा। विदेश नीति और अन्य विषयों पर लगभग दर्जन भर किताबें लिखी हैं। पिछले 50-55 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। आपके देश में पिछले 30-35 साल से बराबर आ रहा हूं। क्या आप मुझे अपने बारे में बताएंगे?
सईद: हां, क्यों नहीं। मेरा जन्म मार्च 1948 में हुआ। मेरे माता-पिता भारत से पाकिस्तान आए थे।
वैदिक: आप क्या बिहार के हैं, मुहाजिर ?
सईद: मेरी मां रोपड़ की थीं और पाकिस्तान आकर उन्होंने मुझे जन्म दिया। इस तरह मेरा भारत से भी संबंध है।
वैदिक: यदि भारत से संबंध है तो फिर यह बताइए कि आपने भारत पर ऐसे भयंकर हमले क्यों करवाए?
सईद: यह बेबुनियाद इल्जाम है। जब बंबई के ताज होटल की खबर मैंने टीवी पर देखी तो क्या देखा कि दो घंटे के अंदर ही अंदर मेरा नाम आने लगा। बार-बार आने लगा।
वैदिक: उसकी कुछ तो वजह होगी?
सईद: वजह बस एक ही थी। पिछली सरकार मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ी हुई थी। उसका गृहमंत्री रहमान मलिक मेरा दुश्मन था। उसने मुझे जबर्दस्ती गिरफ्तार कर लिया।
वैदिक: उनके पास कुछ ठोस सबूत जरूर रहे होंगे?
सईद: सबूत वगैरह कोई नहीं थे। उसे सिर्फ अमेरिका की गुलामी करनी थी। सरकार का दिवाला पिट रहा था। मुझे पकड़कर अमेरिका को खुश कर दिया और बड़ी मदद ले ली, लेकिन मैंने अदालत में सरकार को चारों खाने चित कर दिया।
वैदिक: ये आपकी अपनी अदालतें हैं। यदि ये अंतरराष्ट्रीय अदालतें होतीं तो कुछ और बात होती। मैं आपसे पूछता हूं कि अल्लाहताला का कोई कानून आप मानते हैं या नहीं ?
सईद: क्यों नहीं मानता हूं? मैं तो जिहादी हूं।
वैदिक: क्या अल्लाहताला बेकसूरों की हत्या को जायज मान लेगा? उसकी अदालत में आप क्या जवाब देंगे?
सईद: मैं जिहादी हूं।
वैदिक: मैं तो ‘जिहादे-अकबर’ को मानता हूं। इस ऊंचे जिहाद का मतलब तो मैं यही समझता हूं कि इसमें हिंसा की कोई जगह नहीं है।
सईद: आप फिर मुझ पर इल्जाम लगा रहे हैं। मेरा दहशतगर्दी से कोई लेना-देना नहीं है। मैं हिंसा में विश्वास करता ही नहीं। मैं तो शुद्ध सेवा-कार्य करता हूं। मदरसे चलाता हूं, अनाथों की देखभाल करता हूं और देखिए अभी जो वजीरिस्तान से लाखों लोग भाग रहे हैं, उनकी सेवा सरकार से ज्यादा मेरे संगठन के लोग कर रहे हैं। आप चलें, खुद अपनी आंखों से देखें।
वैदिक: लेकिन आखिर संयुक्त राष्ट्र ने आपके संगठन को गैर-कानूनी क्यों घोषित किया है? अमेरिका ने आपके सिर पर करोड़ों का इनाम क्यों रखा है? भारत सरकार ने आपके खिलाफ ठोस सबूत देकर कई दस्तावेज़ तैयार किए हैं। उन सबका आपके पास क्या जवाब है?
सईद: (थोड़ा उत्तेजित होकर) जवाब क्या है? सारे जवाब मैं दे चुका हूं। क्या मेरे जवाबों से आप संतुष्ट नहीं हैं?
वैदिक: भारत के खिलाफ आप जबर्दस्त नफरत फैलाते हैं। मैंने खुद टीवी पर आपके भाषण सुने हैं।
सईद: और भारत जो हमारे कश्मीरी भाइयों की हत्या करता है, जो बलूचिस्तान और सिंध में दहशतगर्दी फैलाता है, वह कुछ नहीं? अफगानिस्तान को हमारे खिलाफ भड़काता है।
वैदिक: यह बिल्कुल गलत है। हम उस देश की दोस्ताना मदद करते हैं। हिंदुस्तान की जनता आपके नाम से नफरत करती है। मुंबई के रक्तपात को भुलाना मुश्किल है।
सईद: मैं हिंदुस्तानियों की गलतफहमी दूर करना चाहता हूं।
वैदिक: इसका तो एक ही तरीका है कि आप अपना जुर्म कबूल करें और उसकी उचित सजा मांगें। यह आपकी बहादुरी होगी। आप यह रास्ता नहीं अपना सकते हैं तो माफी मांगे।
सईद: (थोड़ी ऊंची आवाज में) मैंने जब कोई जुर्म ही नहीं किया तो इन सब बातों का सवाल ही नहीं उठता।
सईद: यह बताइए कि यह नरिंदर मोदी कैसा आदमी है? इसका आना समूचे दक्षिण एशिया के लिए खतरनाक नहीं है?
वैदिक: इसमें शक नहीं कि नरेंद्र मोदी बहुत सख्त आदमी हैं, लेकिन मोदी साहब ने अपने चुनाव-अभियान में किसी मुल्क के खिलाफ कुछ नहीं बोला। इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ कुछ नहीं बोला। देखिए, आते  ही उन्होंने अपनी शपथ-विधि में पड़ोसी देशों और खासकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को बुलाया।
सईद: क्या बुलाया? बुलाकर बेइज्जत कर दिया। आपकी विदेश सचिव ने कहा कि मोदी ने मियां नवाज को डांट लगाई?
वैदिक: मैंने मियां नवाज, आपके विदेश मंत्री और विदेश सचिव से भी यह पूछा तो उन्होंने ऐसी किसी बात से साफ इनकार किया। यह तो सिर्फ मीडिया की करतूत है।
वैदिक: हम मानते हैं कि भारत-पाक संबंधों की राह में आप सबसे बड़े रोड़े हैं। जरा संबंध सुधरते हैं कि कोई न कोई आतंकवाद की घटना घट जाती है।
सईद: मैं बिल्कुल भी रोड़ा नहीं हूं। आपकी यही गलतफहमी दूर करने के लिए मैं एक बार भारत आना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि दोनों मुल्कों के ताल्लुकात अच्छे बनें। हम दोनों मुल्कों की तहजीब एक जैसी है। मैं भारत के किसी बड़े जलसे में भाषण (तकरीर) देना चाहता हूं।
वैदिक: मुझसे पाकिस्तान में लोगों ने कहा कि मोदी साहब पाकिस्तान क्यों नहीं आते। अगर आएं तो क्या आप पत्थरबाजी करवाएंगे? प्रदर्शन करेंगे? विरोध करेंगे?
सईद : (थोड़ा रुककर) नहीं, नहीं, हम उनका स्वागत (इस्तकबाल) करेंगे।

  

Source :  bhaskar.com
Posted by on Jul 19 2014. Filed under खबर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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