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नौसेनाध्यक्ष का ही इस्तीफा क्यों?

 

Joshi_Navy_PTI

 

हमारी नौसेना के प्रमुख एडमिरल देवेंद्र कुमार जोशी के इस्तीफे ने पूरे देश को भौंचक कर दिया है। यही इस्तीफा यदि रक्षामंत्री एके एंटनी का होता तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में यही होता है। जब कभी कोई असाधारण दुर्घटना सरकार के किसी भी विभाग में होती है तो उसकी जिम्मेदारी उस विभाग का मंत्री लेता है या प्रधानमंत्री लेता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन विभागों में जब भी कोई अच्छा काम होता है तो उसका सेहरा मंत्री या प्रधानमंत्री के सिर पर बंधता है। क्या हमें लालबहादुर शास्त्री के इस्तीफे की याद नहीं है? 1956 में तमिलनाडु में हुई रेल दुर्घटना से क्या शास्त्रीजी का कोई सीधा संबंध था? लेकिन उन्होंने इस्तीफा दिया और नेहरूजी ने उसे स्वीकार किया।
एंटनी से हम शास्त्रीजी बनने की उम्मीद करें, यह तो बालू में से तेल निकालने जैसी बात होगी, लेकिन एडमिरल जोशी के इस्तीफे से उछले  गर्म तेल के छींटे इस सरकार के दामन पर दाग लगाए बिना नहीं रहेंगे। 1959 में जब जनरल केएस थिमैया ने इस्तीफा दिया था तो नेहरू और वीके कृष्ण मेनन की जोड़ी ने देश को समझाया था कि थिमैया चीन के विरुद्ध सतर्कता का अनावश्यक राग अलाप रहे हैं, लेकिन 1962 में उसी चीन की कृपा से भारत की नाक कटी और कृष्ण मेनन का इस्तीफा हुआ। नेहरू की अप्रतिष्ठा और मौत का कारण भी वही चीन बना। लगभग थिमैया की तरह एडमिरल जोशी ही नहीं, जनरल वीके सिंह भी सरकार को चेताते रहे, लेकिन सरकार अपने ही गुंताड़े में उलझी हुई है। उसे अपनी रक्षा नीति और विदेश नीति पर विचार करने की फुरसत ही नहीं है।

हमारी सिंधुरक्षक पनडुब्बी का पिछले साल डूब जाना और अभी सिंधुरत्न पनडुब्बी का यह भयंकर हादसा क्या हमारी रक्षा नीति के लकवाग्रस्त होने का प्रमाण नहीं है? एडमिरल जोशी का इस्तीफा इतनी आसानी से स्वीकार करने वाले प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री से मैं पूछता हूं कि क्या इन खटारा पनडुब्बियों को बदलकर नई पनडुब्बियां खरीदने का अधिकार नौसेना प्रमुख को होता है? यदि नहीं तो किसको होता है? प्रधानमंत्री को होता है? रक्षा मंत्री को होता है? जिन्हें अधिकार होता है, जिम्मेदारी भी उनकी ही होती है। इस्तीफा उन्हीं का होता है, जिनकी जिम्मेदारी होती है। एडमिरल जोशी ने इस्तीफा देकर बड़ी कुर्बानी दी है। अभी उनका डेढ़ साल बचा हुआ था। एंटनी और मनमोहन सिंह तो अब सिर्फ दो-तीन महीने के मेहमान हैं। फिर भी वे कुर्सी से चिपके हुए हैं। उन्होंने साधारण राजनीतिक चातुर्य का भी परिचय नहीं दिया। जरा सोचिए, यदि रक्षा मंत्री का इस्तीफा हो जाता तो लोग कम से कम इस सरकार को कुछ पानीदार समझते, लेकिन इस मामले ने यह सिद्ध किया है कि यह सरकार अराजनीतिक लोग चला रहे हैं।
जो भी हो पिछले दस वर्षों में हमारी फौज के तीनों अंग कमजोर हुए हैं। यह ठीक है कि एंटनी एक ईमानदार रक्षा मंत्री हैं, लेकिन भारत की रक्षा के लिए क्या सिर्फ ईमानदारी ही काफी है? यह भी सही है कि वे हर रक्षा सौदा फूंक-फूंककर करना चाहते हैं, लेकिन ऐसे रक्षा मंत्री का कोई देश क्या करे, जो सिर्फ फूंक ही मारता रह जाए? इस सरकार का रवैया इतना विचित्र रहा है कि यह अपने सेनापतियों की बजाय नौकरशाहों की सलाह मानती रही है, चाहे वह फौज के आधुनिकीकरण का मामला हो या शस्त्रों की खरीद का! हमारी नौसेना का हाल सबसे अधिक दयनीय है।

हमारी सात हजार किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा की रक्षा के लिए जैसी तैयारी होनी चाहिए, क्या वैसी तैयारी हमारे पास है? यह ठीक है कि आजादी के बाद भारत के जितने भी युद्ध हुए हैं, वे मुख्यत: स्थल सीमाओं पर हुए हैं, लेकिन हम यह नहीं भूलें कि भारत के मुकाबले चीन की सामुद्रिक शक्ति तीन गुना बड़ी है और पाकिस्तान जैसा छोटा-सा देश अगले दो-तीन साल में सामुद्रिक शक्ति के लिहाज से भारत के बराबर होने जा रहा है। उसके पास छह पनडुब्बियां हैं। चीन के पास तो ऐसी 50 पनडुब्बियां हैं। हमारे यहां आलम यह है कि स्टेल्थ किस्म की छह पनडुब्बियां खरीदने की मंजूरी 2007 में ही मिल चुकी है पर हमारे रक्षामंत्री अभी उनसे जुड़े मुद्दों का ही परीक्षण करवा रहे हैं। अब तक तीन कमेटियां गठित कर चुके हैं इस काम के लिए। खरीद कार्यक्रम के तहत दो साल पहले ही 12 पनडुब्बियां खरीद ली जानी चाहिए थीं और 2030 तक 12 और खरीदी जानी हैं, लेकिन इनमें से अब तक एक भी नहीं खरीदी जा सकी है। हमारी नौसेना रूस और जर्मनी की 25-30 साल पुरानी पनडुब्बियों से काम धका रही है। 817 करोड़ रुपए लगाकर जिस सिंधुरक्षक पनडुब्बी की हमने रूस से मरम्मत करवाई थी, वह सिंधु या समुद्र की रक्षा क्या करती, खुद की रक्षा ही नहीं कर पाई। जरा सोचें कि किसी वजह से यदि पाकिस्तान और चीन, दोनों से समुद्र में भारत का मुकाबला हो जाए तो क्या होगा? क्या हम भूल गए कि अरबों, पुर्तगालियों और डचों का भारत पर हमला कहां से हुआ था। यदि भारत दक्षिण एशिया की महाशक्ति बनना चाहता है तो उसे अपनी नौसेना पर उचित ध्यान देना होगा। श्रीलंका और मालदीव ही नहीं, फारस की खाड़ी और मॉरिशस तक के समुद्र क्षेत्र पर भी भारत का वर्चस्व अपेक्षित है।

हमारी नौसेना द्वारा मांगी गई छह नई पनडुब्बियों का मामला 2007 से अधर में लटका हुआ है। ये मामले या तो कमेटियों के जंजाल में फंसे रहते हैं या रक्षा-सौदों में चल रहे धांधली में फंसकर दम तोड़ देते हैं। आजादी के 66 साल बाद भी शस्त्र निर्माण के मामले में हम बच्चे बने हुए हैं। पनडुब्बियां और अच्छे लड़ाकू विमान तो दूर की बात है, जवानों के लिए राइफलें भी विदेशों से आयात की जाती हैं। दुनिया में सैन्य शस्त्र और साजो-सामान की खरीद पर पैसा पानी की तरह बहाने वाले देशों में भारत सबसे आगे है। विदेशी शस्त्रास्त्र की खरीद में भारत के नौकरशाह और फौजी अफसर तो हाथ साफ करते ही हैं, उच्चतम स्तर के राजनेता भी दलाली का पैसा खाने में लिहाज नहीं करते। यदि खरीद की व्यवस्था पारदर्शी बन जाए तो अरबों रुपए के नए हथियार तो खरीदे ही जा सकते हैं, ऐसा अनुसंधान और विकास कार्य भी किया जा सकता है कि कुछ वर्षों में हमारा शस्त्र-क्रय कम से कम हो जाए।

इसके अलावा देश के अत्यंत प्रतिभाशाली और बहादुर नौजवानों को फौज में भर्ती होने का आकर्षण भी पैदा किया  जा सकता है। यह सरकार तो अपनी अंतिम सांसें गिन रही है। इससे कुछ भी अपेक्षा करना व्यर्थ है, लेकिन देशभक्त नौकरशाहों और फौजी अफसरों से आशा की जाती है कि वे अपना मनोबल बनाए रखें और चुनाव के बाद जो भी सरकार बने, उसे सिंधुरत्न हादसे के प्रकाश में पर्याप्त फौजी तैयारी के लिए पहले दिन से ही मुस्तैद करें।

 

वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

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अंकिता सिंह

Web Title : Ved Pratap Vaidik Column On Resignation Of Navy Chief

Keyword : submarine accident,INS Sindhuratna,DK Joshi,Admiral DK Joshi,Defence ministry

Posted by on Mar 1 2014. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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