Donation (non-profit website maintenance)

Live Indian Tv Channels

लिखने की आजादी का अर्थ यह नहीं

The Hindu's: An Alternative History

The Hindu’s: An Alternative History

 

वेंडी डॉनिगर की किताब, ‘द हिंदूज : एन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को लेकर भारत के अंग्रेजी अखबारों में जबर्दस्त हाय-तौबा मची हुई है। शायद ही कोई अंग्रेजी अखबार ऐसा हो, जिसने उक्त पुस्तक या उसकी लेखिका के पक्ष में आंसू न बहाए हों। इस पुस्तक को अंतरराष्ट्रीय ख्याति के प्रकाशक ‘पेंगुइन’ ने छापा था और अब उसने इसे रद्द करके बेचने से मनाकर दिया है। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि दिल्ली की एक संस्था ‘शिक्षा बचाओ समिति’ ने इस पुस्तक के विरुद्ध मुकदमा चला रखा था।  वेंडी डॉनिगर की किताब का फैसला सामने आता, उसके पहले ही ‘पेंगुइन’ ने यह फैसला कर लिया। इसे हमारे देश के अंग्रेजीदां ‘बुद्धिजीवी’ एक महान विदेशी प्रकाशक की कायरता मान रहे हैं। वे तर्क यह दे रहे हैं कि वेंडी डॉनिगर जैसी महापंडिता की पुस्तक को रद्द करके इस प्रकाशक ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को चोट पहुंचाई है। हिंदुओं के वैकल्पिक इतिहास की इस असाधारण पुस्तक को कुछ कट्टर हिंदूवादियों ने डरा-धमकाकर डुबवा दिया।

‘पेंगुइन’ जैसे समर्थ और श्रेष्ठ प्रकाशक ने वेंडी की पुस्तक को रद्द कर दिया, इसका अर्थ शायद हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों को समझ में नहीं आया। कोई उनसे पूछे कि अदालत के फैसले के पहले उसने ऐसा फैसला क्यों किया होगा? इसका कारण यह हो सकता है कि वे समझ गए कि अदालत में हार जाएंगे। अदालत में पिछले तीन-चार साल से जो बहस चल रही है, उसमें समिति के सदस्यों नेे उस पुस्तक में से इतनी तथ्यात्मक त्रुटियां और अनर्गल व्याख्याएं निकालकर अदालत के सामने पेश कर दी थीं कि कोई विद्वान जज तो क्या, कोई साधारण आदमी भी हिंदुओं के इस वैकल्पिक इतिहास को रद्द किए बिना नहीं रहेगा।
प्रकाशक यह बहाना बना सकता है और हमारे पश्चिमसेवी बुद्धिजीवी उसे आराम से निगल लेंगे कि उसने हिंदू हुड़दंगियों के डर के मारे उस किताब का प्रकाशन रद्द किया। यह तर्क हम भी मान लेते, लेकिन यह समझ में नहीं आता कि पिछले चार साल में ‘शिक्षा बचाओ समिति’ के लोगों ने कोई हुड़दंग क्यों नहीं मचाया? वे अदालत में क्यों गए? इसीलिए ‘पेंगुइन’ के अधिकारियों का निर्णय सम्मानजनक है। अपनी गलती को स्वीकार करना कायरता नहीं है, बहादुरी है।

वेंडी डॉनिगर की इस पुस्तक पर ‘हिंदू उग्रवादियों’ का नाराज होना स्वाभाविक है, जैसे सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन की किताबों पर मुसलमान नाराज हो गए थे। ईसाई धर्म संबंधी अनेक पुस्तकों पर यूरोप और अमेरिका में काफी बवाल मच चुका है। किसी भी धर्म या श्रद्धा-केंद्र के बारे में जब परंपरा को तोड़ा जाता है तो बवाल तो मचता ही है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या होगा? क्या स्वविवेक की आवाज को दबा दिया जाए? क्या असहमति का गला घोट दिया जाए? क्या मौलिक और नए विचारों पर ताला ठोक दिया जाए? एक तरफ आम लोगों की भावनाएं हैं और दूसरी तरफ कुछ बौद्धिकों का बुद्धिविलास है। इसमें मेरी राय यह है कि हमें कोई न कोई संतुलन कायम करना चाहिए।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जहां तक सवाल है, मैं पूरी तरह से उसका पक्षधर हूं, लेकिन जिसे हम अभिव्यक्ति कह रहे हैं, वह अभिव्यक्ति है या अभिवमन है? शौच या वमन का विरोध कौन कर सकता है। वे तो प्राकृतिक हैं, लेकिन ये काम आप खुलेआम करें तो यह आपकी स्वतंत्रता है या स्वच्छंदता है? इसे आप अपनी स्वतंत्रता मानते हैं, लेकिन वह दूसरों की स्वतंत्रता का हनन करती है। सच्ची स्वतंत्रता वही है, जो न अपनी स्वतंत्रता का हनन करती है न दूसरों की।
वेंडी, विट्जल और कृपाल जैसे अमेरिकी प्राच्यविद् जब रामकृष्ण परमहंस और महात्मा गांधी को गरिमाहीन व्यक्तित्वों की तरह पेश करते हैं, वे शिव और पार्वती तथा कृष्ण और गोपियों के संबंधों की अशालीन व्याख्या करते हैं। वे गणेश की सूंड की आपत्तिजनक तुलना करते हैं। आर्यों को विदेशी बताते हैं और वेदों की मूर्खतापूर्ण व्याख्या करते हैं तो इन अमेरिकी विद्वानों की बुद्धि पर तरस आता है। वे भी क्या करें? वे संस्कृत, हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएं ठीक से जाने बिना हमें भारतीय इतिहास पढ़ाने पर आमादा रहते हैं। यही काम 19वीं सदी में मैक्स मूलर, वाटसन और ग्रिफिथ जैस विद्वानों ने किया था। उनकी तगड़ी खबर दयानंद और अरविंदो जैसे लोगों ने ली थी। गोरी चमड़ी की गुलामी हम भारतीयों का स्वभाव बन गया है। भारत के अंग्रेजीदां बुद्धिजीवी अपने इन आश्रयदाताओं की जूठन की जुगाली करते रहते हैं। इन्हीं विदेशी विद्वानों की खुशामद करते रहने पर उन्हें पश्चिमी विश्वविद्यालयों में मोटी-मोटी नौकरियां मिलती हैं और अनाप-शनाप शोधवृत्तियां मिलती हैं। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘लंदन टाइम्स’ जैसे अखबारों में ये ही अर्ध-शिक्षित भारतीय बुद्धिजीवी इन त्रुटिपूर्ण पुस्तकों की तारीफें पेलते रहते हैं। ये ही लोग भारत के अंग्रेजी अखबारों को गुमराह करते हैं।

खुद वेंडी ने लिखा है कि उन्होंने हिंदुओं के इतिहास वाली पुस्तक अमेरिकी पाठकों के लिए तैयार की थी। अमेरिकी पाठक कौन हैं? उन्हें भारत के बारे में क्या पता है? जब तक उन्हें निर्बाध यौनाचार में लिपटी कहानियां नहीं परोसी जाएंगी, वे इन किताबों को क्यों खरीदेंगे? इसीलिए ये लेखक भारत के देवी-देवताओं, पूजा-पद्धतियों और कर्मकांड को चटपटा और मसालेदार बनाकर पेश करते हैं। उनके हर क्रिया-कलाप को वे भारतीय नजर से नहीं, फ्रायड, एडलर और जुंग की नजर से देखते हैं। यही वेंडी ने भी किया है। उनकी दृष्टि घोर आलोचनात्मक है और वे भारतीय संस्कृति के प्रति पर्याप्त सम्मान नहीं दर्शातीं। इसमें हिंदू धर्म को लेकर बहुत समझ भी नजर नहीं आती। यदि ये विद्वान सचमुच सत्यशोधक होते तो हिंदू धर्म के बारे में ही क्यों, सबसे पहले अपने यहूदी और ईसाई धर्मों के बारे में दो-टूक विश्लेषण करते, जैसे कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ में किया था। इन विद्वानों का लक्ष्य सत्य को जानना नहीं है बल्कि अपने आश्रयदाताओं के छिपे हुए लक्ष्यों को साधना है या फिर अपढ़ लोगों के बीच खुद को विद्वान सिद्ध करना है।

इसका अर्थ यह नहीं कि मैं इस तरह की पुस्तकों पर प्रतिबंध का समर्थक हूं। प्रतिबंध की मांग तो ऐसी पुस्तकों को हजारों नए पाठक दे देती है। जरूरी यह है कि ऐसी पुस्तकों के जवाब में तर्कपूर्ण और तथ्यपूर्ण सशक्त ग्रंथ लिखे जाएं। हम पाठकों को स्वयं निर्णय क्यों नहीं करने देते कि सही कौन है? आपत्तिजनक किताबों को कानून या हुड़दंग से काटने की बजाय जवाबी किताबों से क्यों न काटा जाए?

वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

 

हमें फेसबुक  पर ज्वॉइन करें. 

भारत -एक हिन्दू राष्ट्र

अंकिता सिंह

Web Title : Ved Pratap Vaidik Column On The Hindu’s: An Alternative History

Keyword : The Hindu’s: An Alternative History,ved pratap vaidik,Wendy Doniger

Posted by on Feb 15 2014. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

Leave a Reply

*

Recent Posts