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क्या मोदी का विरोध करने वाले लोकतांत्रिक हैं?

Narendra-Modi

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अभी जो लोग मोदी का विरोध कर रहे हैं, वे कौन से लोकतांत्रिक हैं? कम्युनिस्ट पार्टियां तानाशाही को सैद्धांतिक जामा पहनाकर स्वीकार कर चुकी हैं। और कांग्रेस? उसका तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरह ‘एक चालकानुवर्तित्व (सिर्फ एक संचालक) में परम विश्वास है।

किसी नेता को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाए, ऐसी बहस स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी व्यक्ति को लेकर पहले कभी नहीं चली। आज तक जितने भी प्रधानमंत्री बने, उनके बारे में या तो चुनाव के पहले ही सबको पता होता था या फिर वे चुनाव के बाद जोड़-तोड़ द्वारा नियुक्त किए जाते थे।

कुछ प्रधानमंत्रियों की अचानक मृत्यु या हत्या हो जाने पर भी तत्काल किसी न किसी को प्रधानमंत्री बना दिया गया है। लेकिन आम-चुनाव के साल भर पहले किसी व्यक्ति की प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में नामजदगी के लिए इतनी जबर्दस्त बहस सिर्फ नरेंद्र मोदी को लेकर चली है।

कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस बहस से जनमानस में भाजपा की छवि बिगड़ी है। भाजपा की छवि ऐसी बन गई है कि मानो यह खंड-बंड पार्टी है। इसका कोई एक नेता नहीं है। यह बात कुछ हद तक ठीक है, क्योंकि जब यह बहस चल रही थी तो ऐसे संकेत भी आ रहे थे कि इस मुद्दे पर पार्टी के नेतृत्व में खुली फूट पड़ सकती है और एक नेता ने तो मुझसे यह भी कहा कि मोदी का प्रधानमंत्री बनना तो दूर की कौड़ी है, उसके पहले ही पार्टी टूट जाएगी। लेकिन ज्यों ही मोदी के नाम की घोषणा हुई, ऐसा लगा कि अधमरी-सी लेटी हुई, भाजपा तुरंत उठकर दौडऩे लगी।

पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी दूसरे ही दिन पलटी मारी और मोदी की तारीफ में कसीदे काढ़ दिए। वास्तव में भाजपा देश की एक मात्र ऐसी राष्ट्रीय पार्टी है, जिसमें कभी फूट पड़ी ही नहीं। कांग्रेस टूटी, कम्युनिस्ट पार्टी बिखरी, सोशलिस्ट पार्टी के कई धड़े बने लेकिन भाजपा साबुत की साबुत ही बनी रही। आडवाणी यदि बगावत करते तो वे भी उसी दशा को प्राप्त होते जो बलराज मधोक, वीरेंद्र सकलेचा, कल्याण सिंह और उमा भारती की हुई है। भाजपा वास्तव में कार्यकर्ताओं की पार्टी है। इसमें कोई नेता आज तक हुआ ही नहीं। इसके नेताओं का जनाधार नहीं होता है, दलाधार होता है। यदि वे दल छोड़ दें तो वे गुमनामी के दलदल में गायब हो जाते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी सबसे सफल और लोकप्रिय नेता हुए हैं लेकिन यदि वे भी जनसंघ या भाजपा छोड़ देते तो बिल्कुल अकेले पड़ जाते।

लेकिन नरेंद्र मोदी की हैसियत सारे नेताओं से अलग किस्म की है। गुजरात में उनका अपना जनाधार बन गया है, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनकी मदद करे या न करे। मोदी को इन दोनों संगठनों की जितनी जरूरत है, उससे ज्यादा इन्हें मोदी की जरूरत है। मोदी की अपनी सरकार गुजरात में बनी हुई है। यदि भाजपा को केंद्र में अपनी सरकार बनानी हो तो वह मोदी को निमंत्रण दे, यही वह तर्क था या विवशता थी, जिसने मोदी के मस्तक पर राजतिलक करवा दिया लेकिन अब मोदी यदि अखिल भारतीय नेता बनना चाहते हैं तो उनके लिए भाजपा और संघ का सहारा उतना ही अपरिहार्य बन जाएगा, जितना कि इन दोनों संगठनों के लिए मोदी का बन गया है।

यह परस्पर का आश्रय या जिसे भारतीय तर्कशास्त्र में अन्योन्याश्रय कहा जाता है, भारत की जनता को इस बात की पक्की गारंटी है कि मोदी कभी तानाशाह नहीं बन सकते, जैसे कि हमारे मोदी-विरोधी नेता और पर्यवेक्षक संदेह व्यक्त करते हैं। जो संदेह मोदी के बारे में वामपंथियों को है, वह शिकायत संघियों और शीर्ष भाजपाइयों को भी मोदी से रही है, लेकिन आशा की जाती है कि जैसे गुजरात और भारत में फर्क है, वैसे ही एक मुख्यमंत्री और एक प्रधानमंत्री में भी फर्क होगा। यों भी प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी की बहस ने यह तो सिद्ध कर ही दिया है कि भाजपा कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी या किसी की निजी जागीर नहीं है।

इसीलिए यह डर पैदा करना निराधार मालूम पड़ता है कि देश में अगले साल से तानाशाही या फासीवाद का नया दौर शुरू हो जाएगा। जिस देश ने 1977 में आपातकाल भुगत लिया और फिर उसके कर्ता को भी भुगता दिया, उस देश को दुबारा कोई नेता मूर्ख नहीं बना सकता। अभी जो लोग भी मोदी का विरोध कर रहे हैं, वे कौनसे लोकतांत्रिक हैं? कम्युनिस्ट पार्टियों की अपनी खूबियां हैं लेकिन तानाशाही को वे सैद्धांतिक जामा पहनाकर स्वीकार कर चुकी हैं। और कांग्रेस? वह तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरह ‘एक चालकानुवर्तित्वÓ (सिर्फ एक संचालक) में परम विश्वास करती है।

हमारी ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां भी एकवंशीय एकाधिकार पार्टियां हैं। इसलिए मोदी के विरोध के पीछे भावी तानाशाही का भय उतना नहीं है, जितना यह डर कि मोदी की प्रचंड लहर का मुकाबला ये दल कैसे करेंगे? मोदी-विरोधी दलों ने पहले चाहा कि मोदी को लेकर भाजपा में फूट पड़ जाए लेकिन जब उनकी यह कामना विफल हो गई तो अब वे मोदी के बहाने तानाशाही और सांप्रदायिकता के भूतों को जगा रहे हैं।

जहां तक सांप्रदायिकता का सवाल है, 2002 का गुजरात इतिहास का विषय बन गया है। वरना क्या वजह है कि मोदी के तीसरे चुनाव में गुजरात के मुसलमानों ने बड़ी संख्या में वोट दिए और अब उनकी सभाओं में वे जगह-जगह हजारों की संख्या में भाग ले रहे हैं। अगर 2002 के अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद हादसे को भूलकर देश आगे बढऩा चाहता है तो उसे बढऩे देना सांप्रदायिकता है या नहीं बढऩे देना सांप्रदायिकता है?

इसके अलावा ध्यान देने योग्य बात यह है कि खुद मोदी का कितना विकास हो रहा है। जब से उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय के द्वार पर दस्तक देनी शुरू की है, क्या उन्होंने कोई ऐसी बात कही है या कोई ऐसा काम किया है, जिसे हम संकीर्ण या सांप्रदायिक कह सकें। जिसे ‘हिंदुत्व का पुरोधाÓ कहकर निंदा का पात्र बनाया जाता है, वह ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: का नारा लगा रहा है। मोदी से भयभीत नेतागण इस शुभ-परिवर्तन का स्वागत क्यों नहीं करते?

यों भी मोदी के लिए आम चुनाव में मैदान खाली है। जैसे भाजपा में उनके आगे कोई नहीं टिक सका, आम चुनाव में भी उनको चुनौती देनेवाला कौन है? कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी और मनमोहन सिंह मोदी के सबसे बड़े मित्र साबित हो रहे हैं। अगर राहुल मोदी के प्रतिद्वंद्वी हैं तो मोदी निरस्त्र रहते हुए ही मैदान मार लेंगे। मनमोहन सिंह जैसा प्रधानमंत्री भारत में पहले कोई हुआ ही नहीं। वे खुद तो सत्ता में 10 साल रह गए और अब उनको ही श्रेय मिलेगा कि उन्होंने मोदी के बैठने के लिए अपनी कुर्सी तैयार कर दी है। नमो (नरेंद्र मोदी) और ममो (मनमोहन) की इस जुगलबंदी को मेरा नमस्कार !

लेखक  : वेदप्रताप वैदिक

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Posted by on Sep 21 2013. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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