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क्यों बेहतर हैं नरेंद्र मोदी ?

Gujarat's chief minister Narendra Modi speaks during the "Vibrant Gujarat Summit" at Gandhinagar in the western Indian state of Gujarat January 12, 2013. Fresh off his re-election as chief minister of Gujarat and amid expectations he could contend to be the next prime minister, Modi avoided talk of a bigger political future during a state investment event. REUTERS/Amit Dave (INDIA - Tags: POLITICS)

बंबई प्रांत के मेहसाणा में एक बेहद साधारण परिवार में जन्मे नरेंद्र भाई मोदी के बारे में कहा जाता है कि वह किसी जमाने में अपने बड़े भाई के साथ चाय की दुकान चलाते थे, और अब अपने प्रांत गुजरात में जीत की हैट-ट्रिक जमाने और रिकार्ड चौथी बार कार्यभार संभालने के बाद भी देश के किसी भी अन्य राज्य से बेहतर चला रहे है। इसी आधार पर उन्हें भाजपा की ओर से पार्टी के भीष्म पितामह कहे जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी पर तरजीह देकर प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया गया। उनका भविष्य में देश को चलाने का दावा भी सबसे अधिक मजबूत बताया जा रहा है। अनेक मीडिया चैनलों और सर्वे एजेंसियों द्वारा कराये गए सर्वेक्षणों में भी वह देशवासियों की सबसे बड़ी  बताये जा रहे है। देश में विरोधियों के अनेक स्तरों पर यह बहस चल रही है कि आखिर मोदी ही क्यों बेहतर हैं।

राजनीति में वही बेहतर राजनीतिज्ञ कहलाता है जो भविष्यदृष्टा होता है, यानी मौजूदा वक्त की नब्ज से ही भविष्य की इबारत लिख जाता है। भाजपा के सबसे  वरिष्ठ नेता आडवाणी के संदर्भ में बात करें तो ‘अटल युग’ में ‘मोदी’ नजर आने वाले आडवाणी देश के उप प्रधानमंत्री पद पर ही ठिठक जाने के बाद ‘अटल’ बनने की कोशिश में जिन्ना की मजार पर चादर चढ़ाने जा पहुंचे थे। इसका लाभ जितना हो सकता था वह यही है कि वह कथित धर्म निरपेक्ष दलों द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी से बेहतर दावेदार कहे जाने के भुलावे में हैं। उनके साथ आम यथास्थितिवादी और कांग्रेस-भाजपा को एक-दूसरे की ए या बी टीम कहने वालों में यह विश्वास भी है कि देश की व्यवस्था जैसी है, थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ यथावत चलती रहेगी।

आडवाणी के इसी नफे-नुकसान के बीच से मोदी पैदा हुए हैं। उनके आने से इस व्यवस्था से विश्वास खो चुकी जनता में नया विश्वास पैदा होता है कि वही हैं जो मौजूदा (कांग्रेस-भाजपा की) व्यवस्था को तोड़कर और यहां तक कि भाजपा से भी बाहर निकलकर, और कहीं, राष्ट्रपिता गांधी के देश की आजादी के बाद कांग्रेस को भंग करने के साथ ही दिए गए वक्तव्य ‘इस देश को कोई उदारवादी तानाशाह ही चला सकता है’ की परिकल्पना को भी साकार करते नजर आते हैं। प्रधानमंत्री पद पर देशवासियों की पसंद के लिहाज से दूसरे-तीसरे नंबर पर अरविन्द केजरीवाल और राहुल गांधी हैं, जो मोदी के समक्ष राजनीतिक अनुभवहीन ही कहे जाएंगे।

मोदी दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कामर्स में छात्रों के समक्ष विकास की राजनीति को देश के भविष्य की राजनीति करार देते हुए अपने ‘वाइब्रेंट गुजरात’ का मॉडल पेश कर अपने ‘मिशन 272+’ की शुरुवात करते हैं। वह संभवतया पहले नेता हैं जो युवकों से अपनी पार्टी की विचारधारा से जुड़ने का आह्वान करने के बजाय उनसे वोट बैंक व जाति तथा धर्मगत राजनीति छोड़ने की बात कहते हैं, और साथ ही उन्हें आर्थिक गतिशीलता का विकल्प भी दिखाते हैं। मजेदार बात यह भी है कि उनका विकास का मॉडल कमोबेस देश की मौजूदा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का वही मॉडल है, जिसकी खूब आलोचना हो रही है, लेकिन वह विकास की इस दौड़ में सबको शामिल करने का संभव तरीका सुझाते हुए विश्वास जगाते हैं कि कैसे मुट्ठी भर लोगों की जगह सबको नीचे तक लाभ दिया जा सकता है। ऐसा वह हवा-हवाई भी नहीं कह रहे, इसके लिए वह अपने गुजरात और भारत देश के विकास का तुलनात्मक विवरण भी पेश करते हैं। वह स्वयं सांप्रदायिक नेता कहलाए जाने के बावजूद अपने राज्य में हर जाति-वर्ग का वोट हासिल कर ऐसा साबित कर चुके हैं। उन्होंने अपने राज्य में चलने वाली ‘खाम’ यानी क्षत्रिय, आदिवासी और मुसलमानों के गठबंधन की परंपरागत राजनीति के चक्रव्यूह को तोड़ा है। यह सब जिक्र करते हुए वह सफल प्रशासक के रूप में अपनी विकास, प्रबंधन व राजनीति की साझा समझ से प्रभावित करते हुए छात्रों-युवाओं की खूब तालियां बटोरते हैं।

 

क्या फर्क है गुजरात और भारत में। गुजरात में किसी का तुष्टीकरण नहीं होता, इसलिए वहां ‘सांप्रदायिक’ सरकार है। देश में एक धर्म विशेष के लोगों की लगातार उपेक्षा होती है। वहां सत्तारूढ़ पार्टी अपना हर कदम मात्र एक धर्म विशेष के लोगों के तुष्टीकरण के लिए उठाती है, बावजूद वह ‘धर्मनिरपेक्ष’ है। गुजरात में गोधरा कांड हुआ, इसलिए वहां का नेता अछूत है, हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते। लेकिन देश के नेता की नीतियों से कृषि प्रधान देश के सैकड़ों किसानों ने आत्महत्या कर ली, हजारों युवा बेरोजगारी के कारण मौत को गले लगा रहे हैं। बेटियों-बहनों से बलात्कार रुक नहीं पा रहे हैं। महंगाई दो जून की रोटी के लिए मोहताज कर रही है। भ्रष्टाचार जीने नहीं दे रहा। कैग भ्रष्टाचार के आंकड़े पेश करते थक गया है, इतनी बड़ी संख्याएं हैं कि गिनती की सीमा-नील, पद्म, शंख तक पहुंच गई हैं। और अब तो केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन भी चालू वित्त वर्ष में देश की आर्थिक वृद्धि दर के विनिर्माण, कृषि एवं सेवा क्षेत्र के खराब प्रदर्शन के चलते एक दशक में सर्वाधिक घटकर पांच प्रतिशत पर आने का अनुमान लगा रहा है। बावजूद यह विकास की पक्षधर सरकार है, जिसके अगुवा देश के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्री हैं। वह न होते तो पता नहीं कैसे हालात होते। शायद इसीलिए आगे हम उनके राजकुमार में ही अपना अगला प्रधानमंत्री देख रहे हैं। हमें सड़क से, गांव से निकला व्यक्ति अपना नेता नहीं लग सकता। शायद हमारी मानसिकता ही ऐसी हो गई है, या कि ऐसी बना दी गई है।

विरोध से भी मजबूत होते जाने की कला 

लेकिन इस सबके बावजूद एक तबके का मानना है मोदी देश के प्रधानमंत्री नहीं हो सकते। कतई नहीं हो सकते। क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर उनके धुर विरोधियों के पास भी ‘गोधरा’ के अलावा कोई दूसरा नहीं है। बस, वह नहीं हो सकते, तो नहीं हो सकते। विपक्षी कांग्रेस सहित उनके एनडीए गठबंधन की अन्य पार्टियों के साथ ही मीडिया को भी वह खास पसंद नहीं आते। जब भी उनका नाम उनके कार्यो के साथ आगे आता है, या कि भाजपा उन्हें अपना प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताती है, तो विपक्षी दलों के साथ ही दिल्ली में बैठी मीडिया को गुजरात का ‘2002 का गोधरा’ याद आ जाता है, लेकिन कभी दिल्ली में बैठकर भी ‘1984 की दिल्ली’ याद नहीं आती, हालिया दिनों का मुजफ्फरनगर भी भुलाने की कोशिश की जाती है। दिल्ली के श्रीराम कॉलेज के गेट के बाहर भी दिल्ली के छात्र गुटों को गुजरात के दंगों के कथित आरोपी का आना गंवारा नहीं, लेकिन उन्हें दिल्ली के दंगों की याद नहीं है। फिर भी वह कहते हैं, उनका विरोध प्रायोजित नहीं है।

हालिया गुजरात विधान सभा चुनावों के दौरान विपक्षी कांग्रेस पार्टी को गुजरात में कुपोषित बच्चे व समस्याग्रस्त किसान फोटो खिंचवाने के लिए भी नहीं मिलते। लिहाजा मुंबई के कुपोषण से ग्रस्त बच्चों और राजस्थान के किसानों की फोटो मीडिया में छपवाई जाती हैं, वह विपक्षी पार्टी के प्रायोजित विज्ञापन हैं, ऐसा छापने से हमें कोई रोक नहीं सकता। पर हम जो लिखते हैं, दिखाते हैं, क्या वह भी प्रायोजित है। नहीं, तो हम एकतरफा क्यों दिखाते हैं। क्यों विपक्ष की भाषा ही बोलते हुए हमारी सुई बार-बार ‘गोधरा’ में अटक जाती है। हम गुजरात चुनाव के दौरान ही गुजरात के गांव-गांव में घूमते हैं। वहां के गांव देश के किसी बड़े शहर से भी अधिक व्यवस्थित और साफ-सुथरे हैं। हम खुद टीवी पर अपने गांवों-शहरों के भी ऐसा ही होने की कल्पना करते हैं। गुजरात में क्या हमें आज कहीं ‘गोधरा’ नजर आता है, या कि गुजरात तुष्टीकरण की राजनीति के इतर सभी गुजरातियों को एक इकाई के रूप में साथ लेकर प्रगति कर रहा है। गुजरात ने जो प्रगति की है, वह किसी दूसरे देश से आए लोगों ने आकर या किसी दूसरे देश के कानूनों, व्यवस्थाओं के जरिए नहीं की है, उन्हें एक अच्छा मार्गदर्शक नेता मिला है, जिसकी प्रेरणा से आज वह ऐसे गुजरात बने हैं, जैसा देश बन जाए तो फिर ‘विश्वगुरु’ क्या है, देश का गौरवशाली अतीत क्या है, हम निस्सदेह विकास की नई इबारत लिख सकते हैं।

तो यह डर किसका है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम मोदी के जादू से डरे हुए हैं, वह एक बार सत्तासीन हो जाते हैं तो जीत की हैट-ट्रिक जमा देते हैं, लोगों के दिलों पर छा जाते हैं। कहीं दिल्ली पर भी सत्तासीन हो गए तो फिर उन्हें उतारना मुश्किल हो जाएगा। हमारी बारी ही नहीं आएगी। यह डर उस विकास का तो नहीं है, जो मोदी ने गुजरात में कर डाला है, कि यदि यही उन्होंने देश में कर दिया तो बाकी दलों की गुजरात की तरह ही दुकानें बंद हो जाएंगी। या यह डर उस ‘सांप्रदायिकता’ का है, जिससे गुजरात एक इकाई बन गया है। या उस स्वराज और सुराज का तो नहीं है, जिससे गुजरात के गांव चमन बन गए हैं। उस कर्तव्यशीलता का तो नहीं है, जिससे गुजरात के किसान रेगिस्तान में भी फसलें लहलहा रहे हैं, गुजरात के युवा फैक्टरियों में विकास की नई इबारत लिख रहे हैं। गुजरात बिजली, पानी से नहा रहा है।

या यह डर मोदी के उस साहस से है, जिसके बल पर मोदी चुनाव परिणाम आने के तत्काल बाद अपनी जीत के अंतर को कम करने वाले अपने धुर विरोधी हो चुके राजनीतिक गुरु केशुभाई से आशीर्वाद लेने उनके घर जाते हैं। प्रधानमंत्री पद पर नाम  घोषित किये  जाने के बाद सबसे पहले नाराजगी जताने वाले लाल कृष्ण आडवाणी के घर की ही राह पकड़ते हैं। उन्हें अपना सबसे प्रबल विरोध कर रहे आडवाणी के सार्वजनिक मंच पर पांव छूने से भी कोई हिचक नहीं है। उनके पास ‘ऐसा या वैसा होना चाहिए’ कहते हुए शब्दों की लफ्फाजी से भाषण निपटाने की मजबूरी की बजाए अपने किए कार्य बताने के लिए हैं। वह अपने किये कार्यों पर घंटों बोल सकते हैं, उनके समक्ष अपने ‘गौरवमयी इतिहास’ शब्द के पीछे अपनी वर्तमान की विफलताऐं छुपाने की मजबूरी कभी नहीं होती। वह पानी से आधा भरे और आधे खाली गिलास को आधा पानी और आधा हवा से भरे होने की दृष्टि रखते हैं, और देश की जनता और खासकर युवाओं को दिखाते हैं। ऐसी दृष्टि उन्होंने ‘सत्ता के पालने’ में झूलते हुए नहीं अपने बालों को अनुभव से पकाते हुए प्राप्त की है। बावजूद उनमें युवाओं से कहीं ओजस्वी जोश है, उन्हें देश वासियों को भविष्य के सपने दिखाने के लिए किसी दूसरी दुनिया के उदाहरणों की जरूरत नहीं पड़ती। वह पड़ोसी देश पाकिस्तान सहित पूरे विश्व को ललकारने की क्षमता रखते हैं। वह अपने घर का उदाहरण पेश करने वाले अपनी ही गुजरात की धरती के महात्मा गांधी व सरदार पटेल जैसे देश के गिने-चुने नेताओं में शुमार हैं, जो केवल सपने नहीं दिखाते, उन्हें पूरा करने का हुनर भी सिखाते हैं। इसके लिए उन्हें कहीं बाहर से कोई शक्ति या जादू का डंडा लाने की जरूरत भी नहीं होती, वरन वह देश के युवाओं व आमजन में मौजूद ऐसी शक्ति को जगाने का ‘जामवंत’ सा हुनर रखते हैं, और स्वयं अपनी शक्तियों को जगाकर ‘हनुमान’ भी हो जाते हैं। उन्हें भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता, नाकारापन के साथ भूख, महंगाई, बलात्कार, लूट, चोरी, डकैती जैसी अनेकों समस्याओं से घिरे देश के एक छोटे से प्रांत में इन्हीं कमजोरियों से ग्रस्त जनता, राजनेताओं और नौकरशाहों से ही काम निकालते हुऐ विकास का रास्ता निकालना आता है, जिसके बल पर वह गुजरात के रेगिस्तान में भी दुनिया के लिए फसलें लहलहा देते हैं।

वह मौजूदा शक्तियों, कानूनों से ही आगे बढ़ने का माद्दा रखते हैं, और मौजूदा कानूनों से ही देश को आगे बढ़ाने का विश्वास जगाते हैं। वह नजरिया बदलने का हुनर रखते हैं, नजरिया बदलना सिखाते हैं, विकास से जुड़ी राजनीति के हिमायती हैं। एक कर्मयोगी की भांति अपने प्रदेश को आगे बढ़ा रहे हैं, और अनेक सर्वेक्षणों में देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में सर्वाधिक पसंदीदा राजनेता के रूप में उभर रहे हैं।

लिहाजा, उनका विरोध होना स्वाभाविक ही है। सरहद के पार भी देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में नाम आने पर सर्वाधिक चिंता उन्हीं के नाम पर होनी तय है, और ऐसा ही देश के भीतर भी हो सकता है। लेकिन जनता दल-यूनाइटेड सरीखे दलों को समझना होगा कि अपना कद छोटा लगने की आशंका में आप दूसरों के बड़े होते जाने को अस्वीकार नहीं कर सकते। वरन राजनीतिक तौर पर भी यही लाभप्रद होगा कि आप बड़े पेड़ के नीचे शरण ले लें, इससे उस बड़े पेड़ की सेहत को तो खास फर्क नहीं पड़ेगा, अलबत्ता आप जरूर आंधी-पानी जैसी मुसीबतों से सुरक्षित हो जाएंगे। आप जोश के साथ बहती नदी पर चाहे जितने बांध बनाकर उसे रोक लें, लेकिन उसे अपना हुनर मालूम है, वह बिजली बन जाएगा, रोके जाने के बाद भी अपना रास्ता निकालते हुए सूखी धरती को भी हरीतिमा देता आगे बढ़ता जाएगा। नरेंद्र भाई मोदी भी ऐसी ही उम्मीद जगाते हैं। उनमें पहाड़ी नदी जैसा ही जोश नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मोदी के मंत्र:

  • तरक्की के लिए कार्यकुशलता, तेजी व व्यापक नजरिया जरूरी।
  • उत्पाद की गुणवत्ता और पैकेजिंग जरूरी। हमें उत्पादन बड़ाना है और ‘मेड इन इंडिया’ टैग को हमें क्वालिटी का पर्याय बनाना है।
  • युवा जाति-धर्मगत व वोट बैंक की राजनीति से बाहर निकलें। तरक्की का रास्ता पकड़ें।
  • 21वीं सदी भारत की। भारत अब सपेरों का नहीं ‘माउस’ से दुनिया जीतने वाले युवाओं का देश है।
  • विकास से ही देश में आएगा विराट परिवर्तन, विकास ही है सभी समस्याओं का समाधान।
  • 60 साल पहले स्वराज पाया था, अब सुराज (गुड गर्वनेंस) की जरूरत।
  • आशावादी बनें, न कहें आधा गिलास भरा व आधा खाली है, कहें आधा गिलास पानी और आधा हवा से भरा है।

मोदी का गुजरात मॉडलः

  • गुजरात ने पशुओं की 120 बीमारियां खत्म की, जिससे दूध उत्पादन 80 फीसदी बढ़ा। गुजरात का दूध दिल्ली से लेकर सिंगापुर तक जाता है।
  • गुजरात में एक माह का कृषि महोत्सव होता है। यहां की भिंडी यूरोप और टमाटर अफगानिस्तान के बाजार में भी छाये रहते हैं।
  • गुजरात में 24 घंटे बिजली आती है। नैनो देश भर में घूमकर गुजरात पहुंच गई। गुजरात में बने कोच ही दिल्ली की मैट्रो में जुड़े हैं।
  • गुजराती सबसे बढ़िया पर्यटक हैं। वह पांच सितारा होटलों से लेकर हर जगह मिलते है।
  • गुजरात दुनिया का पहला राज्य है जहां फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी है। फोरेंसिक साइंस आज अपराध नियंत्रण की पहली जरूरत है।
  • गुजरात में देश की पहली सशस्त्र बलों की यूनिवर्सिटी है। गुजरात के पास तकनीक की जानकार सबसे युवा पुलिस-शक्ति है।
  • पूरा देश गुजरात में बना नमक इस्तेमाल करता है।

 

लेखक  : नवीन जोशी ‘नवेंदु’ 

Blog : क्यों बेहतर हैं नरेंद्र मोदी ?

 
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भारत -एक हिन्दू राष्ट्र

अंकिता सिंह

Web Title : Why India needs a leader like Narendra Modi?

Keyword : Narendra Modi, Electoral College, BJP, NAC, UPA, Shashi Shekhar, Lokpal, Congress, Parliaments, American

Posted by on Feb 22 2014. Filed under मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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