Donation (non-profit website maintenance)

Live Indian Tv Channels

Why Indian Men Involved In Gang Rape

 

क्‍यों गैंग रेप करते हैं भारतीय पुरुष?

 

rape

दिल्ली में पिछले साल 23 साल की पैरामेडिकल छात्रा के साथ बस में हुए गैंग रेप और वहशियाना बर्ताव ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. चारों ओर से उमड़े जबरदस्त विरोध प्रदर्शनों का नतीजा हुआ कि रेप कानून को सख्त बनाया गया. फिर भी महज 8 महीने बाद देश को एक बार फिर वैसी ही एक घटना का सामना करना पड़ रहा है. दोनों वाकयों में काफी कुछ समानता है.

बड़े शहर की चहल-पहल के बीच एक लड़की और लड़का किसी एकांत जगह पर फंस जाते हैं. युवकों की एक टोली उन्हें पकड़ लेती है. लड़के की पिटाई कर उसके हाथ-पैर बांध दिए जाते हैं और फिर लड़की के साथ बारी-बारी से रेप किया जाता है, जब तक कि वह बेहोश और मृतप्राय न हो जाए. गंभीर चोटों के कारण दिल्ली गैंग रेप पीडि़ता की आखिरकार मौत हो गई थी, लेकिन पिछले हफ्ते मुंबई गैंग रेप के दंश को झेलने वाली लड़की अपनी पीड़ा बयान करने के लिए जिंदा है.

यह एक बेचैन कर देने वाली कहानी है. इससे बढ़ते आपराधिक ग्राफ का पता तो चलता ही है, ऐसे अपराधियों की मानसिकता के बारे में भी पता चलता है कि कैसे युवकों की एक टोली अकेली महिला के साथ दुष्कर्म करती है, कैसे इस घृणित काम में वे एक-दूसरे का साथ देते हैं और उस कराहती लड़की के दर्द से रोमांचित होते हैं.

देश में सबसे तेजी से बढऩे वाला अपराध रेप है. 1971 से 2011 के बीच इसमें 873 फीसदी का इजाफा हुआ है, लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में ‘गैंग रेप’ का कोई जिक्र नहीं है. न तो श्रेणी और न ही संख्या के मामले में. बंगलुरू के नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया में क्रिमिनोलॉजी एंड विक्टिमोलॉजी के प्रोफेसर के. चोकलिंगम कहते हैं, ”हमें आंकड़े चाहिए, अपराधियों की प्रोफाइल चाहिए, लेकिन भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है.”

2013 की घटनाओं पर गौर करें. जनवरी में अमृतसर में 29 साल की एक लड़की को बस से उतार लिया जाता है और सात लोग उसके साथ गैंग रेप करते हैं. फरवरी में दिल्ली में 24 साल की एक लड़की के साथ चलती कार में चार लोग रेप करते हैं. मार्च में मध्य प्रदेश में अपने पति के साथ कैंप कर रही 39 साल की एक स्विस महिला के साथ गैंग रेप की खबर आती है. अप्रैल में कर्नाटक के बेलगांव में गैंग रेप की शिकार एक कॉलेज छात्रा का शव मिलता है. जून में दो मामले सुर्खियों में होते हैं- मणिपाल में एक मेडिकल छात्रा और मनाली के पास 20 साल की एक अमेरिकी पर्यटक शिकार बनती हैं. जुलाई में 24 साल की युवती ने मुजफ्फरनगर में एफआईआर दर्ज कराई कि खाप के निर्देश पर उसके देवरों ने उनके साथ गैंग रेप किया. इसी महीने ओडिसा के गंजम में 28 साल की एक नन का अपहरण कर तीन लोग उसके साथ गैंग रेप करते हैं. कुछ ही हफ्ते बाद हरियाणा में चलती ट्रेन में एक महिला कांस्टेबल के साथ गैंग रेप होता है. पूरे देश में इस तरह की घटनाएं बार-बार हो रही हैं.

पॉलिटिक्स ऑफ मैस्क्युलिनिटी में विशेषज्ञता रखने वाले पुणे विश्वविद्यालय के मंगेश कुलकर्णी कहते हैं, ”इनमें से ज्यादातर मामले सेक्स से कहीं ज्यादा ताकत से जुड़े हैं. ताकत का एहसास तभी होता है, जब इसका इस्तेमाल हो. यानी क्या आप में यह ताकत है कि आप किसी व्यक्ति से उसकी मर्जी के खिलाफ कुछ करा पाएं?”

इसके अलावा तबका विशेष, लिंग विशेष, स्थान और समय विशेष से जुड़े जटिल मुद्दे भी गैंग रेप की घटनाओं से जुड़े होते हैं. दिल्ली और मुंबई, दोनों ही मामलों में अपराधी झुग्गी झेंपडियों में रहने वाले थे, जबकि उनकी शिकार लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी थीं और उनका रहन-सहन निश्चित तौर पर उनसे बेहतर था. दोनों ऐसी जगह पर ऐसे वक्त थीं, जो किसी महिला के लिए पारंपरिक लिहाज से ‘लक्ष्मण रेखा’ के बाहर की जगहें थीं- दिल्ली में रात 9.30 बजे, जबकि मुंबई की सुनसान मिल में शाम के धुंधलके के बाद.

कुलकर्णी कहते हैं, ”कई पुरुषों के लिए सेक्स संबंधी बर्ताव इस बात का प्रतीक होता है कि वे अपने बारे में क्या सोचते हैं.” खास तौर पर जब पुरुष झुंड में हों तो उनके कथित पौरुष का इजहार उस महिला पर नहीं, बल्कि अपने पुरुष साथियों पर रौब गांठने के लिए होता है. वे आगे कहते हैं, ”उस वक्त औरत का शरीर महज एक साधन होता है, सिर्फ एक वस्तु. शायद एक पॉर्न क्लिप की तरह, जिसे अक्सर पुरुष साथ बैठकर देखते हैं और साथियों के बीच अपनी मर्दानगी का मुजाहिरा करने के लिए वैसा ही कुछ करके दिखाते हैं. एक औरत का उसके लिए तब तक कोई मायने नहीं, जब तक कि वह परिवार की न हो और मर्दानगी का एहसास दिलाती हो.”

मनोचिकित्सक डॉ. संजय चुग कहते हैं, ”गैंग रेप आम तौर पर एक ऐसा गुनाह है, जिसे अंजाम देने वाले एक दूसरे की झिझक को खत्म करने में साझेदार बनते हैं. जब वे पकड़े नहीं जाते तो सोचने लगते हैं कि महिलाएं सार्वजनिक तौर पर इसे बताने से डरती हैं.”

मुंबई गैंग रेप के आरोपी विजय जाधव ने कथित तौर पर पुलिस को बताया है कि उसने पहले भी कचरा बीनने वाली चार लड़कियों के साथ उसी जगह पर रेप किया था. हर बार वे वीडियो क्लिप दिखाकर पीडि़तों को डरा-धमकाकर चुप करा देते थे. क्या गैंग रेप पहले से सोच-समझकर, योजना बनाकर किया जाने वाला कोई अपराध है या यह संयोगवश हो जाता है? चोकलिंगम का मानना है, ”यह दोनों ही स्थितियों में हो सकता है. बस खास चीजों के बदकिस्मती से एक साथ आ जुड़ने भर की देरी है. अगर पहले भी गैंग रेप को अंजाम दे चुके मर्दों का कोई गिरोह किसी अंधेरी और एकांत जगह में एक लड़की को देखे, जो उस जगह से अनजान हो, वहां कोई पुलिस गश्त न होती हो या वह जगह बिलकुल सुनसान हो तो वे जरूर इस मौके का फायदा उठाना चाहेंगे.”

कुलकर्णी का कहना है, ”आवारा कुत्तों के झुंड से सही मायने में डरना तो पड़ता है. यह साथियों के दबाव और झुंड में खुद को सबसे दमदार मर्द साबित करने की लालसा है.”

झुंड में खुद को नेता की भूमिका में देख रहा व्यक्ति आम तौर पर सबसे ज्यादा असुरक्षा की भावना से ग्रसित होता है, यानी सबसे ज्यादा हिंसक होता है और अपना रौब जताने के लिए वह कुछ भी कर सकता है.

मुंबई की इस घटना का अगुआ कौन था? पुलिस मोहम्मद कासिम हफीज शेख उर्फ बंगाली की ओर उंगली दिखा रही है. वह सबसे ज्यादा हिंसक था और उसने लड़की के साथ दो बार जबरदस्ती की. उसने रणनीति तैयार की, फर्जी रेलवे पुलिस अधिकारियों के काल्पनिक नाम बताए और सबसे पहले रेप किया. जोखिम लेने की बेलगाम आदत वाला बंगाली वहां से भागने के बाद जुआ खेलने भी गया, जबकि उसकी जेब में सिर्फ 900 रुपये थे. सारे पैसे हारने के बाद वह एक अस्पताल की भीड़ में शामिल हो गया था, जहां उससे थोड़ी ही दूरी पर उस पीडि़ता का इलाज हो रहा था.

न्यूरोसाइंस कहता है कि आदमी के व्यवहार में कुछ विकासवादी चीजें होती रहती हैं. बंगलुरु के नेशनल काउंसिल ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज में न्यूरो बायोलॉजी के प्रोफेसर सुमंत्र चटर्जी का कहना है, ”यह ‘नए दिमाग’ और ‘पुराने दिमाग’ से जुड़ा मसला है. समूह में किए गए बर्ताव को ‘पुराने दिमाग’ के सिद्धांत के जरिए बताया गया है. ‘पुराना दिमाग’ मनुष्य का आदिम हिस्सा है. यह हिस्सा सेक्स, हिंसक रवैए, अपने इलाके पर हकदारी के साथ ही लगाव, गुस्से और डर जैसी प्रतिक्रियाएं दिखाता है. ‘नया दिमाग’ बुद्धि का वह हिस्सा है, जिसके अंदर ‘पुराना दिमाग’ स्थित है और जिसमें भाषा और कल्पना बसती है.

प्रोफेसर चटर्जी कहते हैं, ”मनुष्य के किसी चरम क्रूरता के बर्ताव में यह संभव है कि ‘नए दिमाग’ के नेटवर्क पर ‘पुराना दिमाग’ हावी हो गया हो. लेकिन बायोलॉजी कहानी का एक हिस्सा मात्र है. मनुष्य सिर्फ एक जीव नहीं है. हम पर आसपास के माहौल का भी काफी असर पड़ता है.”

गैंग रेप की बढ़ती घटनाओं के लिए समाजशास्त्री माहौल को जिम्मेदार ठहराते हैं. दीपंकर गुप्ता के लिए समस्या की जड़ तेजी से बदल रहा आर्थिक वातावरण है. कुछ दशक पहले तक हर सरकार के पास काम की तलाश में आने वाले प्रवासियों को बसाने की जगह मौजूद थी. गुप्ता कहते हैं, ”पुराने जमाने के रोजगार बेशक उतने कारगर नहीं थे, लेकिन वे अनजाने में अपनी एक सामाजिक भूमिका निभा रहे थे.”

मेहनतकश प्रवासी मजदूर अच्छी मजदूरी और पेंशन पा रहा था, उसे किफायती घर मिल रहा था, जिसमें वह अपने परिवार को रखता था और अपने बच्चों को पढ़ा पा रहा था. आज मजदूर ठेके पर रखे जा रहे हैं. उन्हें किसी तरह की सुरक्षा नहीं दी जा रही. उनके सिर पर छत नहीं है, परिवार का कोई सहारा नहीं है. ऐसे में परिस्थितिवश जब ऐसे लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर बैठते हैं तो उनकी एक टोली बन जाती है. वे बेढंगे काम करते फिरते हैं और उन कामों के नतीजों के बारे में नहीं सोचते.

”वे किसी के भी प्रति जवाबदेह नहीं होते और उनका ऐसा कोई अपना नहीं होता, जिसके पास वे लौटकर जा पाएं. यह एक ऐसा झुंड है, जहां आग लगी हुई है.”

मुंबई की वह लड़की जानती है कि जिंदगी के साथ जंगली बनकर पेश आ रहे लोगों का सामना करना क्या होता है. ढहती दीवारों, लंबी-घनी झडियों और अंधेरे में डूबी काईदार इमारतों और सांपों से भरे सूखे कुएं वाले 14 एकड़ के उस खंडहर में उसने अपनी जिंदगी की जंग लड़ी है और अपने साथ बर्बरता करने वाले लोगों को सींखचों के भीतर घसीटा है. 23 अगस्त को अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए उसने राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य और मुंबई की पूर्व मेयर निर्मला सामंत प्रभावलकर को बताया था, ”उन्होंने मुझसे कहा, ‘नहीं छोड़ेंगे.’ उन्होंने मेरा फोटो लिया है और पुलिस में नहीं जाने की धमकी दी है. अगर वे मेरे पीछे आए तो क्या होगा? उसके डर को फिलहाल तो मुंबई पुलिस ने दूर कर दिया है. पर क्या देश तैयार है उस स्याह स्थिति का सामना करने के लिए, जहां नपुंसक मर्दानगी महिलाओं की जिंदगी से खिलवाड़ करके खुद की पीठ थपथपा रही है?

Source : Aaj Tak

Short URL: http://jayhind.co.in/?p=2907

Posted by on Sep 6 2013. Filed under आधी आबादी, मेरी बात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

Leave a Reply

*

Recent Posts

Photo Gallery