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स्वतंत्रता नारी स्वयं पा लेगी, हम होते कौन हैं देने वाले?

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‘ईश्वर के बराबर ही हम नारी के ऋणी हैं। पहले तो स्वयं अपने जीवन के लिए। दूसरे इस जीवन को जीने योग्य बनाने के लिए।’   -अज्ञात

महिलाओं पर लिखने की पात्रता मुझमें नहीं। किन्तु कुछ प्रश्न स्वयं से किए और उत्तर भी सोचे। आज का कॉलम वही।
नारी की सबसे बड़ी बात क्या है?
— बच्चों को बड़ा करना। पाल-पोसकर ही नहीं, शिक्षित-दीक्षित कर। उनमें संस्कार भरकर।

ऐसा क्या है जो हम पुरुषों का सबसे बड़ा उद्देश्य है- किन्तु पूरा स्त्री कर रही है?

— आने वाले कल को श्रेष्ठ बनाना। बच्चों के लिए। हम पुरुषों का ध्यान कहीं न कहीं स्वयं को सुखी रखने में भटक जाता है।

तो क्या स्त्री का जीवन बच्चों को ही समर्पित है?

— परिवार को। महिला समझती है कि बड़े तो जानते हैं कि क्या करना-न करना। फिर बच्चों के लिए वह प्रयास कर कुछ नहीं करती। सबकुछ स्वाभाविक। नैसर्गिक।

इतना कुछ भयावह घट रहा है। महिलाएं क्या सोचती होंगी?
— यही कि पुरुष कमजोर है। पाप को हावी होने दे रहा है।

यानी हर पुरुष को दोषी मानती होंगी?
— कमज़ोर। दोषी तो पाप करने वाले को ही।

स्त्री की पुरुष से अपेक्षा क्या है?

— समानता। अतिरिक्त सम्मान नहीं। एक जैसा व्यवहार।

और सुरक्षा?

— जो सबको मिले। नारी के मन में तो यही होगा कि समानता दीजिए। सुरक्षा की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।

क्या यही एक कमी है?

— यह सबसे बड़ा अन्याय है।

बच्चियों की पढ़ाई-लिखाई से ऐसा दूर हो सकेगा?

— निश्चित। किन्तु पढ़ाई केवल एक कदम है। समानता से भी आगे है- स्वतंत्रता। वह चाहिए।

क्या महिला स्वतंत्र नहीं है?

— कतई नहीं। उसे निर्णय लेने का अधिकार नहीं।

किन्तु जो ऊंची पढ़ाई कर रही हैं, वे तो दूसरों के भी फैसले ले रही हैं?
— बिल्कुल। किन्तु स्वयं के निर्णय तो वे भी नहीं ले रहीं। कोई रोक नहीं रहा, किन्तु नहीं लेतीं।
यह तो उनकी अपनी भूल या कमी है। इसके लिए किसे दोष?
— वातावरण को। वर्षों से ऐसा हो रहा है। हालांकि एक जागरूकता आई है।
तो इतनी ऊंची पढ़ाई का क्या लाभ?
— पढ़ाई, शिक्षा देती है। शक्ति देती है। योग्यता, क्षमता और दक्षता बढ़ाती है। किन्तु वातावरण बदलने में बहुत समय लगेगा।
वातावरण क्या पुरुष बदलेंगे?
— दोनों। स्वामी विवेकानंद ने सरलता से समझाया है कि ‘…हम मनुष्य हैं, न कि स्त्री-पुरुष। और हम एक दूसरे के काम आने के लिए बने हैं।’
किन्तु पुरुष को ईश्वर ने ही कुछ बातों में बेहतर बनाया है। उसका क्या?
—  कतई नहीं। जिस बेहतर शारीरिक बल की बात पुरुष करते हैं – वह अपने स्थान पर सही है। किन्तु उस बल का उपयोग? और भीतरी बल यानी हिम्मत तो महिला में अधिक है।
क्या हिम्मत स्त्री में अधिक है?
— निश्चित ही। तीन बातों में स्त्री, पुरुष से कहीं आगे है-
* शौर्य – यानी हिम्मत। निडरता।
* त्याग – नि:स्वार्थ। निश्चल।
* पवित्रता – सत्य। न्याय।
निडर कहां है नारी? अन्यथा इतने अत्याचार क्यों झेलती?
— शारीरिक दमन। जहां दैहिक बल से शोषण है – वहीं वह विवश है। किन्तु संसार के बड़े-बड़े संकट, परिवार पर आई विपदा वह अनूठी निडरता से सहती है। लड़ती है। हम अपने परिवार में ही ढूंढ सकते हैं कई उदाहरण।

किन्तु नारी मुख्यत: कोमल है?

— कोमलता उसकी प्रकृति है। तीन विशेषताएं नारी को तेजस्वी बनाती हैं :
* सौंदर्य – यानी आकर्षक। स्वस्थ।
* संगीत – कोमल। मधुर।
* संस्कृति – जीवनशैली। परंपरा।
नारी की सबसे बड़ी ताकत?
— प्रेम। अर्थात् मानवता। भावना। जोडऩा।
सबसे बड़ी कमज़ोरी?
— प्रेम ही। इसे स्पष्ट करना आवश्यक नहीं।
किस गुण का परिणाम मिल ही नहीं रहा?
— कर्म। यानी अनंत संघर्ष। अथक परिश्रम। सदियां कराह उठीं, किन्तु महिलाओं को इसका परिणाम नहीं मिला।

वो क्या है जो वह कभी नहीं छोड़ेगी?

— धर्म। अर्थात् कर्तव्य। परोपकार। आस्था।
चाहे उसे समानता ना मिले?
— महिला को समानता मिले, यह असंभव है। किन्तु देनी ही होगी। दिलानी ही होगी। बल्कि देने वाले, दिलाने वाले हम पुरुष कौन?

पूर्ण समानता, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता किसी भी मनुष्य की तरह नारी का मौलिक, जन्मसिद्ध अधिकार है। वह इसे लेकर ही रहेगी। स्वयं प्राप्त करेगी। इसलिए हमें अपनी आंखें अब खोल लेनी चाहिए। चीनी लोकोक्ति है आंखें तीन तरह से खुलती हैं-
* मनन से – जो सबसे कठिन है।
* अनुकरण से – जो सबसे सरल है।
* अनुभव से – जो सबसे कड़वा है।
अच्छा होगा यदि हम महिलाओं को समानता देने के लिए ‘दूसरी’ तरह से अपनी आंखें खोलें। अन्यथा तीसरी दृष्टि खुलेगी, जो विकट है।
( कल्पेश याग्निक : लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)

Posted by on Mar 8 2014. Filed under आधी आबादी. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can skip to the end and leave a response. Pinging is currently not allowed.

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